श्लोक 4
🕉️ संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
यत्तु कामार्थं सङ्कल्पं कर्म कर्तुमिच्छति तदा ।
सैवाभिरुचिर्भूतानां प्रबलः प्रलयं गच्छति ॥4॥
🔤 IAST Transliteration
yattu kāmārthaṁ saṅkalpaṁ karma kartum icchati tadā |
saivābhirucir bhūtānāṁ prabalaḥ pralayaṁ gacchati ||4||
🇮🇳 हिंदी अनुवाद
जो व्यक्ति केवल अपने काम और इच्छाओं की पूर्ति के लिए कर्म करना चाहता है,
उसकी यह प्रवृत्ति जीवों के लिए प्रबल और विनाशकारी होती है।
🇬🇧 English Translation
One who desires to act solely for the fulfillment of personal desires and pleasures,
that desire becomes strong and destructive for all beings.
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या
श्लोक 4 में श्रीकृष्ण ने काम और इच्छाओं से प्रेरित कर्मों के विनाशकारी परिणाम के बारे में स्पष्ट किया है।
यह श्लोक बताता है कि यदि मनुष्य केवल अपने स्वार्थ और इच्छाओं के लिए कर्म करता है, तो उसका प्रभाव न केवल स्वयं पर बल्कि दूसरों पर भी नकारात्मक पड़ता है।
1️⃣ कामार्थं सङ्कल्पं — इच्छाओं के लिए कर्म
कर्म केवल काम और स्वार्थ की पूर्ति के लिए होना अनर्थकारी है।
ऐसे कर्म में स्वार्थ, लालच और आसक्ति प्रधान होती है।
2️⃣ सैवाभिरुचिर्भूतानां — जीवों के लिए आकर्षक और प्रभावशाली
अपने इच्छाओं के पीछे दौड़ने वाला व्यक्ति अन्य जीवों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है, क्योंकि यह प्रवृत्ति लालच और असंतोष पैदा करती है।
3️⃣ प्रबलः प्रलयं गच्छति — प्रबल और विनाशकारी
इस तरह के कर्म प्रबल रूप में जीवन को भ्रष्ट करते हैं।
इसका प्रभाव स्वयं और समाज दोनों के लिए विनाशकारी होता है।
🔑 श्लोक का संदेश
श्रीकृष्ण इस श्लोक में स्पष्ट करते हैं कि:
केवल स्वार्थ और इच्छाओं की पूर्ति के लिए कर्म करना हानिकारक और विनाशकारी है।
सच्चा और फलदायी कर्म ज्ञान, श्रद्धा और दैवी गुणों पर आधारित होना चाहिए।
अपने कर्मों को स्वार्थ रहित और गुणयुक्त बनाना जीवन का सर्वोत्तम मार्ग है।
🌍 Detailed English Explanation
Verse 4 warns about selfish, desire-driven actions:
Actions motivated solely by personal desires and material gains are strong and destructive in their impact.
Such actions generate attachment, greed, and dissatisfaction, affecting not only the actor but also others.
Krishna emphasizes that righteous, detached, and virtue-based action is the path to true spiritual growth and harmony.
This teaches that selfless action aligned with knowledge and faith is essential for peace and progress.
🌱 जीवन के लिए सीख (Life Lessons)
✅ हिंदी में
केवल स्वार्थ और इच्छाओं के लिए कर्म करना हानिकारक है
ऐसे कर्म दूसरों और समाज के लिए विनाशकारी प्रभाव डालते हैं
कर्म को ज्ञान, श्रद्धा और दैवी गुणों के आधार पर करना चाहिए
निष्काम और गुणयुक्त कर्म ही आत्मिक उन्नति और मोक्ष की कुंजी हैं
✅ In English
Acting only for selfish desires is destructive
Such actions negatively affect others and society
Actions should be guided by knowledge, faith, and divine qualities
Selfless, virtue-aligned actions are the key to spiritual growth and liberation
🕯️ निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 4 यह स्पष्ट करता है कि काम और स्वार्थ से प्रेरित कर्म विनाशकारी होते हैं।
श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि सच्चे, निष्काम और गुणयुक्त कर्म ही जीवन में स्थायी सुख और मोक्ष प्रदान करते हैं।
🌸 स्वार्थ रहित और गुणयुक्त कर्म अपनाएँ—सच्चे जीवन और मोक्ष की ओर बढ़ें।
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