श्लोक 15
🕉️ संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥15॥
🔤 IAST Transliteration
āḍhyo'bhijanavānasmi ko'nyo'sti sadṛśo mayā |
yakṣye dāsyāmi modiṣye ity ajñāna-vimohitaḥ ||15||
🇮🇳 हिंदी अनुवाद
हे पार्थ! मैं अभी-अभी अमीर और शक्तिशाली हुआ हूँ, मेरे समान और कोई नहीं है।
मैं दासता करूँगा, मैं आनन्दित करूँगा—ऐसा सोचते हुए अज्ञान और मोह में लोग भ्रमित रहते हैं।
🇬🇧 English Translation
“I have just become wealthy and mighty; none equals me.
I will give and enjoy; thus deluded by ignorance and infatuation, people become blinded.”
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या
श्लोक 15 में श्रीकृष्ण ने आसुरी प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के अहंकार और अज्ञान को उजागर किया है।
यह श्लोक बताता है कि संपत्ति और शक्ति प्राप्त करने के बाद अहंकार और मोह कैसे बढ़ते हैं।
1️⃣ “आढ्योऽभिजनवानस्मि” — अभी-अभी संपन्न होने का अहंकार
व्यक्ति अपने अभी-अभी प्राप्त धन, शक्ति या प्रतिष्ठा को देखकर अभिमानी बन जाता है।
यह अहंकार उसे दैवी गुणों और सच्चे विवेक से दूर कर देता है।
2️⃣ “कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया” — आत्म-मुग्धता
वह स्वयं को सर्वोत्तम और अद्वितीय मानने लगता है।
यह दृष्टि असत्य और भ्रामक है, क्योंकि जीवन और संपत्ति अस्थायी हैं।
3️⃣ “यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य” — भ्रम और मोह
व्यक्ति सोचता है कि अब वह दे सकता है और आनंद ले सकता है।
यह सोच अज्ञान और मोह से उत्पन्न होती है।
परिणामस्वरूप, वह वास्तविक संतोष और नैतिकता को भूल जाता है।
🔑 श्लोक का संदेश
श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि अहंकार और मोह संपत्ति और शक्ति से बढ़ते हैं, और यह:
व्यक्ति को भ्रांति और अज्ञान में डालता है
वास्तविक सुख और मोक्ष की ओर से दूर ले जाता है
इसे छोड़कर ही दैवी दृष्टि और संयम अपनाया जा सकता है
🌍 Detailed English Explanation
Verse 15 highlights the self-delusion and arrogance that arise from wealth and power:
People newly empowered by money or position believe they are supreme and unrivaled.
They become infatuated with giving and enjoying, mistaking temporary gains for ultimate achievement.
Krishna warns that ignorance and infatuation blind the mind, preventing spiritual growth and ethical living.
This shloka teaches that detachment and humility are essential even after attaining wealth or status.
🌱 जीवन के लिए सीख (Life Lessons)
✅ हिंदी में
संपत्ति और शक्ति अहंकार और मोह को बढ़ाती हैं
अभी-अभी प्राप्त चीजों में आत्म-मुग्ध होना खतरनाक है
अज्ञान और मोह से व्यक्ति नैतिकता और संतोष खो देता है
संयम, दैवी दृष्टि और विनम्रता अपनाकर ही सच्चा सुख और मोक्ष प्राप्त होता है
✅ In English
Wealth and power increase ego and infatuation
Being self-absorbed with recent gains is dangerous
Ignorance and infatuation lead to loss of ethics and contentment
Discipline, divine vision, and humility lead to true happiness and liberation
🕯️ निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 15 यह स्पष्ट करता है कि संपत्ति और शक्ति के अहंकार आसुरी प्रवृत्ति का मुख्य स्रोत हैं।
श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि दैवी दृष्टि, संयम और विनम्रता अपनाकर ही जीवन में स्थायी सुख और मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
🌸 अहंकार और मोह से मुक्त हों—सच्चे जीवन और मोक्ष की ओर बढ़ें।