📜 संस्कृत श्लोक (Devanagari)
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥67॥
🔤 IAST Transliteration
idaṃ te nātapaskāya nābhaktāya kadācana |
na cāśuśrūṣave vācyaṃ na ca māṃ yo ’bhyasūyati || 18.67 ||
🪔 हिंदी अनुवाद
हे अर्जुन, यह ज्ञान कभी भी तपस्वी, या अध्भक्त (जो मेरी भक्ति नहीं करता) या ईर्ष्यालु व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए।
यह मेरे प्रति ईर्ष्यापूर्ण या दुर्भावना रखने वाले किसी व्यक्ति से कभी साझा नहीं किया जाना चाहिए।
🌍 English Translation
O Arjuna, this knowledge should never be imparted to an ascetic, a person without devotion, or anyone envious of Me.
It is not to be spoken to the wicked or those harboring ill will towards Me.
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या (Detailed Hindi Explanation)
यह श्लोक बताता है कि सत्य और परम ज्ञान का सही उपयोग किस प्रकार होना चाहिए, और कौन इसे ग्रहण करने के योग्य है।
🔸 “इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन”
नातपस्काय: साधक, लेकिन केवल तपस्वी या ब्राह्मण होने भर से योग्य नहीं
नाभक्ताय: जो मेरी भक्ति नहीं करता, उसे ज्ञान नहीं दिया जाना चाहिए
कदाचन: कभी भी
इसका मतलब है कि ज्ञान केवल सच्चे श्रद्धालु और भक्त को ही दिया जाना चाहिए।
🔸 “न चाशुश्रूषवे वाच्यं”
न च: और नहीं
आशुश्रूषवे वाच्यं: तुरंत सेवा करने वाले को, जो केवल सुनने या तात्कालिक लाभ के लिए ज्ञान लेता है
ज्ञान का गहन और सतत अभ्यास आवश्यक है
🔸 “न च मां योऽभ्यसूयति”
योऽभ्यसूयति: जो ईश्वर से ईर्ष्या करता है
शिष्य बनने के लिए ईर्ष्या और द्वेष रहित होना जरूरी है
यह ज्ञान का दुरुपयोग रोकने और उसे उचित मार्ग पर रखने का निर्देश है
🔸 आधुनिक जीवन में संदेश
आज:
लोग आध्यात्मिक ज्ञान को असत्य या स्वार्थ के लिए ग्रहण कर लेते हैं
गीता सिखाती है कि ज्ञान केवल सच्चे भक्त, निष्काम और श्रद्धालु व्यक्ति को दिया जाना चाहिए
यह श्लोक ज्ञान की पवित्रता और नैतिक जिम्मेदारी पर जोर देता है
यह श्लोक जीवन में ज्ञान का सही उपयोग, योग्य शिष्य और ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति की शिक्षा देता है।
🌱 Detailed English Explanation
This verse highlights the responsibility of imparting supreme knowledge.
🔹 Key Points
Not for ascetics or non-devotees (Nātapaskāya Nābhaktāya)
Knowledge must be given to sincere devotees, not merely to ascetics or scholars
True devotion is essential for receiving wisdom
Not for the unworthy or superficial (Nā Śuśrūṣave Vācyam)
Knowledge should not be shared with those seeking superficial benefits
Requires continuous practice and sincere engagement
Not for the envious (Na Māṃ Yo ’bhyasūyati)
Those harboring jealousy or ill will towards God cannot truly grasp the knowledge
Ensures knowledge is respected and not misused
🔹 Modern Relevance
In today’s world, spiritual knowledge is often misused for personal gain or prestige
Gita teaches: wisdom should only be shared with those who are sincere, devoted, and free of malice
Highlights moral responsibility and ethical transmission of knowledge
🌼 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)
🪔 हिंदी जीवन-पाठ
ज्ञान का सही प्रयोग
परम ज्ञान केवल योग्य और भक्त व्यक्तियों को दिया जाना चाहिए।
श्रद्धा और भक्ति की आवश्यकता
बिना भक्ति और ईमानदारी के ज्ञान ग्रहण करना अनुचित है।
ईर्ष्या और द्वेष से बचें
ज्ञान का उपयोग केवल सच्चे उद्देश्य और आध्यात्मिक उन्नति के लिए होना चाहिए।
नैतिक जिम्मेदारी
शिक्षक और शिष्य दोनों को ज्ञान की पवित्रता बनाए रखनी चाहिए।
ज्ञान का सम्मान
ज्ञान का गलत उपयोग करने से न केवल व्यक्ति का नुकसान होता है बल्कि उसका आध्यात्मिक विकास भी रुक जाता है।
🌿 English Life Lessons
Proper use of knowledge
Supreme knowledge should only be given to the deserving and devoted.
Necessity of faith and devotion
Learning without devotion and sincerity is inappropriate.
Avoid envy and ill will
Knowledge must be used for spiritual growth, not selfish motives.
Moral responsibility
Both teacher and student must preserve the sanctity of wisdom.
Respect for knowledge
Misusing knowledge hinders spiritual growth and personal development.
🔔 आधुनिक जीवन में श्लोक 18.67 की प्रासंगिकता
आज के समय में:
लोग आध्यात्मिक ज्ञान को जल्दी या स्वार्थपूर्ण तरीके से ग्रहण कर लेते हैं
गीता सिखाती है कि ज्ञान केवल श्रद्धालु और योग्य व्यक्ति को ही दिया जाना चाहिए
यह मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक संतुलन सुनिश्चित करता है
गीता का संदेश है:
ज्ञान का सही उपयोग केवल श्रद्धा, भक्ति और ईर्ष्या रहित मन वाले लोगों के लिए है।
🧘♂️ निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद गीता का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि:
ज्ञान का आदर और सही उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है
सच्चा भक्त, निष्काम और ईर्ष्या रहित व्यक्ति ही ज्ञान ग्रहण कर सकता है
यह श्लोक ज्ञान की पवित्रता, नैतिक जिम्मेदारी और भक्त योग का संदेश देता है
गीता का संदेश है: परम ज्ञान का आदर करें और इसे केवल योग्य, श्रद्धालु और ईर्ष्या रहित व्यक्तियों के साथ साझा करें।