📜 संस्कृत श्लोक (Devanagari)
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥4॥
🔤 IAST Transliteration
tataḥ padaṁ tat parimārgitavyaṁ
yasmin gatā na nivartanti bhūyaḥ |
tam eva cādyaṁ puruṣaṁ prapadye
yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī ||4||
🇮🇳 हिंदी अनुवाद
उस संसार रूपी वृक्ष को काटने के बाद
उस परम पद की खोज करनी चाहिए,
जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं पड़ता।
उसी आदि पुरुष (परमात्मा) की मैं शरण ग्रहण करता हूँ,
जिससे यह प्राचीन सृष्टि प्रवृत्त हुई है।
🇬🇧 English Translation
After cutting down that tree, one should seek that supreme abode,
having gone where, one never returns again.
I surrender to that primeval Supreme Person,
from whom this ancient flow of creation has emanated.
🕉️ विस्तृत हिंदी व्याख्या (Detailed Hindi Explanation)
पिछले श्लोक (15.3) में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष को असंग रूपी शस्त्र से काटना चाहिए।
अब श्लोक 4 में वे बताते हैं कि:
👉 उसके बाद क्या करना है?
👉 असली लक्ष्य क्या है?
🔍 “ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं” – इसके बाद क्या?
ततः – उसके बाद
पदं – वह स्थान / अवस्था
परिमार्गितव्यं – खोजने योग्य
अर्थात्:
केवल संसार से वैराग्य पर्याप्त नहीं
केवल मोह त्याग देना ही अंतिम लक्ष्य नहीं
📌 त्याग के बाद लक्ष्य की खोज आवश्यक है
यह लक्ष्य है — परम पद।
🌟 परम पद क्या है?
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः
यह वह अवस्था है:
जहाँ जाकर आत्मा फिर जन्म नहीं लेती
जहाँ सुख-दुःख, समय और मृत्यु नहीं
जहाँ केवल शांति, ज्ञान और आनंद है
👉 यही:
मोक्ष
ब्रह्मधाम
वैकुण्ठ
परमात्मा की शरण
🔁 संसार क्यों छोड़ना आवश्यक है?
संसार:
आवागमन (जन्म-मृत्यु) से भरा है
अस्थायी है
दुःख का कारण है
जब तक आत्मा:
संसार को सत्य मानती है
स्वयं को शरीर समझती है
तब तक:
❌ बार-बार लौटना पड़ता है
🙏 “तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये” – शरणागति का रहस्य
यह पंक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है।
श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं:
मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ
👉 यहाँ शरणागति (प्रपत्ति) का सिद्धांत प्रकट होता है।
शरणागति का अर्थ:
अहंकार का त्याग
स्वयं को परमात्मा को समर्पित करना
“मैं करता हूँ” की भावना छोड़ना
🌍 आदि पुरुष कौन है?
आद्यं पुरुषं
अर्थात:
जो सबसे पहले है
जिससे सब उत्पन्न हुआ
जो समय से परे है
👉 वही:
परमात्मा
पुरुषोत्तम
श्रीकृष्ण का परम स्वरूप
🌊 सृष्टि का स्रोत
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी
इस श्लोक में बताया गया है:
यह सृष्टि नई नहीं
यह एक प्राचीन प्रवाह है
जो बार-बार प्रकट और लीन होती है
लेकिन:
📌 परमात्मा अपरिवर्तनीय हैं
📌 वही मूल स्रोत हैं
🧠 गूढ़ संदेश (Key Insight)
श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर देते हैं:
❌ केवल संसार छोड़ना समाधान नहीं
✔ परमात्मा की शरण ही समाधान है
👉 वैराग्य + भक्ति = मुक्ति
🌍 Detailed English Explanation
In Verse 15.4, Lord Krishna reveals the ultimate goal of spiritual life.
🔍 After Cutting the Tree, What Next?
Renunciation alone is incomplete.
After detachment:
One must seek the supreme abode
Otherwise, emptiness arises
Spiritual life is not about negation, but divine connection.
🌟 The Supreme Abode
This supreme state is:
Beyond birth and death
Free from suffering
Eternal and blissful
Once attained, there is no return to samsara.
🙏 The Importance of Surrender
Krishna emphasizes:
Prapadye – I surrender
Liberation does not come by ego or effort alone,
but by complete surrender to the Supreme Person.
🌊 Source of All Creation
The universe flows from the Supreme,
but He remains untouched by change.
Returning to Him means returning home.
🧠 Core Teaching
True freedom lies not in escape,
but in reunion with the Source.
🌱 जीवन के महत्वपूर्ण पाठ (Life Lessons)
🇮🇳 हिंदी में जीवन सीख
त्याग के बाद लक्ष्य ज़रूरी है
मोक्ष का अर्थ है — न लौटना
शरणागति ही सबसे ऊँचा मार्ग है
परमात्मा ही मूल स्रोत हैं
🇬🇧 Life Lessons in English
Renunciation must lead to realization
Liberation means no return to suffering
Surrender is the highest path
The Supreme is the source of all existence
🧘 निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद्गीता अध्याय 15 का यह चौथा श्लोक
हमें जीवन का अंतिम लक्ष्य स्पष्ट रूप से बताता है।
🌳 संसार को काटो
🌟 परम पद को खोजो
🙏 परमात्मा की शरण लो
👉 यही पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा है।
जब आत्मा:
संसार से मुक्त होती है
और परम स्रोत से जुड़ती है
तभी:
✨ सच्ची शांति, स्थायी आनंद और मोक्ष प्राप्त होता है।