📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥9॥
🔤 IAST Transliteration
mac-cittā mad-gata-prāṇā bodhayantaḥ parasparam |
kathayantaś ca māṁ nityaṁ tuṣyanti ca ramanti ca ||9||
🪔 हिंदी अनुवाद
जिनका चित्त मुझमें स्थित है,
जिनके प्राण मुझमें अर्पित हैं,
जो एक-दूसरे को मेरे विषय में समझाते हैं
और निरंतर मेरी कथाएँ करते हैं—
वे भक्त सदा तृप्त रहते हैं और आनंद में मग्न रहते हैं।
🌍 English Translation
With their minds absorbed in Me,
their lives devoted to Me,
they enlighten one another
and constantly speak of Me.
Thus, they remain ever satisfied
and rejoice in spiritual bliss.
📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या
भगवद गीता अध्याय 10 का यह नवम श्लोक शुद्ध भक्ति (Pure Bhakti) की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करता है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण यह नहीं बताते कि भक्त क्या करते हैं, बल्कि यह बताते हैं कि भक्त कैसे जीते हैं।
इस श्लोक में भक्ति के तीन स्तर स्पष्ट होते हैं:
🔹 1. मच्चित्ता – जिनका मन मुझमें लगा है
यह केवल ध्यान की स्थिति नहीं है,
बल्कि जीवन की दिशा है।
ऐसे भक्त:
हर परिस्थिति में ईश्वर को याद रखते हैं
सुख में अहंकार नहीं करते
दुःख में टूटते नहीं
उनका मन संसार में रहता हुआ भी ईश्वर में स्थिर रहता है।
🔹 2. मद्गतप्राणा – जिनके प्राण मुझमें समर्पित हैं
यह भक्ति का गहरा स्तर है।
यहाँ केवल विचार नहीं, पूरा अस्तित्व भगवान को अर्पित होता है।
इसका अर्थ है:
जीवन का उद्देश्य बदल जाना
“मैं क्या चाहता हूँ” से
“भगवान क्या चाहते हैं” की ओर बढ़ जाना
🔹 3. बोधयन्तः परस्परम् – एक-दूसरे को जाग्रत करना
सच्चा भक्त अकेला नहीं रहता।
वह:
दूसरों को प्रेरित करता है
ज्ञान साझा करता है
भक्ति को फैलाता है
यह सत्संग की शक्ति है।
🔹 4. कथयन्तश्च मां नित्यम् – निरंतर भगवान की चर्चा
भक्तों की बातचीत:
निंदा नहीं
शिकायत नहीं
व्यर्थ चर्चा नहीं
बल्कि ईश्वर-कथा होती है।
🔹 5. तुष्यन्ति च रमन्ति च – तृप्ति और आनंद
यह श्लोक का सबसे सुंदर फल है।
👉 तुष्यन्ति – अंदर से संतुष्ट
👉 रमन्ति – आत्मिक आनंद में लीन
ऐसे भक्त:
बाहरी साधनों पर निर्भर नहीं रहते
उनकी खुशी परिस्थितियों से नहीं जुड़ी होती
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि:
भक्ति बोझ नहीं, आनंद की अवस्था है।
📘 Detailed English Explanation
This verse beautifully describes the inner life of a true devotee.
Krishna explains that devotees:
Keep their minds absorbed in Him
Dedicate their very life force to Him
Enlighten one another through spiritual discussions
Constantly speak about His glories
The result is not tension or escapism, but:
Deep satisfaction
Continuous joy
This verse proves that devotion is not dry discipline,
but a joyful, shared, and living experience.
Such devotees are emotionally fulfilled because their happiness is rooted in the eternal.
🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)
🔸 हिंदी में
सच्ची भक्ति जीवन को आनंदमय बना देती है
ईश्वर-स्मरण से मन स्थिर होता है
सत्संग आध्यात्मिक प्रगति को तेज करता है
जो देता है, वही पाता है — ज्ञान और आनंद
आंतरिक तृप्ति ही सच्ची सफलता है
🔸 In English
True devotion leads to inner joy
God-centered life brings stability
Spiritual sharing multiplies wisdom
Devotion removes inner emptiness
Contentment is real success
🔔 निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 9 यह स्पष्ट करता है कि
भक्ति कोई एक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है।
जिनका मन, प्राण और संवाद भगवान श्रीकृष्ण में स्थित होता है,
वे संसार में रहते हुए भी
सदैव तृप्त, प्रसन्न और आनंदित रहते हैं।
यही विभूति योग का जीवंत रूप है—
ईश्वर के साथ जीना।