Thursday, February 26, 2026

🌍 “सृष्टि के मूल में कौन है? ऋषि, मनु और मानव जाति का रहस्य!” भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 6 का गूढ़ अर्थ (विभूति योग)


📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥6॥


🔤 IAST Transliteration

maharṣayaḥ sapta pūrve catvāro manavas tathā |
mad-bhāvā mānasā jātā yeṣāṁ loka imāḥ prajāḥ ||6||


🪔 हिंदी अनुवाद

प्राचीन सात महर्षि और चार मनु,
मेरे ही भाव से, मेरे मन से उत्पन्न हुए हैं;
और इन्हीं से इस लोक की समस्त प्रजा उत्पन्न हुई है।


🌍 English Translation

The seven great sages of ancient times
and the four Manus
were born from My mind, endowed with My nature;
from them all the living beings in this world have descended.


📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या

भगवद गीता अध्याय 10 का यह छठा श्लोक हमें सृष्टि की आध्यात्मिक वंशावली (Spiritual Lineage) से परिचित कराता है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि संपूर्ण मानव जाति और सामाजिक व्यवस्था का मूल स्रोत वही हैं

🔹 सप्त महर्षि कौन हैं?

वैदिक परंपरा के अनुसार, ये सात महान ऋषि (सप्तर्षि) हैं:

  • मरीचि

  • अत्रि

  • अंगिरा

  • पुलस्त्य

  • पुलह

  • क्रतु

  • वसिष्ठ

ये ऋषि केवल तपस्वी नहीं थे, बल्कि ज्ञान, धर्म और सृष्टि-नियंत्रण के वाहक थे।

🔹 चार मनु कौन हैं?

मनु मानव समाज के आदि विधाता और शासक माने जाते हैं।
मनु ही मनुष्य शब्द का मूल हैं।

मनु समाज को:

  • नियम

  • धर्म

  • कर्तव्य

  • शासन व्यवस्था

देने वाले माने जाते हैं।

🔹 “मानसा जाता” – मन से उत्पन्न

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण शब्द है “मानसा”
इसका अर्थ है — शरीर से नहीं, मन से उत्पन्न

भगवान स्पष्ट करते हैं कि:
👉 ऋषि और मनु किसी भौतिक प्रक्रिया से नहीं,
👉 बल्कि ईश्वरीय चेतना से उत्पन्न हुए

🔹 “मद्भावा” – मेरे ही स्वरूप से

इन महर्षियों और मनुओं में जो ज्ञान, विवेक और धर्म था,
वह भगवान के ही भाव का प्रतिबिंब था।

इसका अर्थ यह है कि:

  • सच्चा धर्म मानव-निर्मित नहीं

  • बल्कि ईश्वर-प्रेरित है

🔹 “येषां लोक इमाः प्रजाः”

इन ऋषियों और मनुओं से ही:

  • मानव जाति

  • समाज

  • सभ्यता

  • संस्कृति

का विकास हुआ।

यह श्लोक यह भी सिखाता है कि हम सभी ईश्वर की ही चेतना की संतान हैं,
इसलिए भेदभाव, अहंकार और घृणा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।


📘 Detailed English Explanation

This verse outlines the divine origin of human civilization.

Krishna explains that:

  • The ancient seven sages (Saptarishis)

  • The four Manus, progenitors of mankind

were born directly from His mind, not through physical means.

This signifies that:

  • Dharma is divinely inspired

  • Human order has spiritual roots

  • Society is meant to function in alignment with cosmic law

By stating that all living beings descend from these sages and Manus, Krishna establishes the unity of humanity under divine consciousness.


🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)

🔸 हिंदी में

  1. मानव जाति की जड़ आध्यात्मिक है, भौतिक नहीं

  2. सच्चा धर्म ईश्वर से उत्पन्न होता है

  3. हम सभी एक ही दिव्य चेतना से जुड़े हैं

  4. अहंकार और भेदभाव अज्ञान का परिणाम हैं

  5. समाज का उद्देश्य धर्म और कल्याण होना चाहिए

🔸 In English

  1. Humanity has a divine origin

  2. Dharma is spiritually rooted

  3. All beings share one cosmic source

  4. Ego and division arise from ignorance

  5. Society should align with higher values


🔔 निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 6 हमें यह स्मरण कराता है कि
हम केवल शरीर नहीं, बल्कि एक दिव्य परंपरा की कड़ी हैं

ऋषि, मनु और मानव —
सभी की उत्पत्ति भगवान श्रीकृष्ण की चेतना से हुई है।

जब हम यह समझ लेते हैं,
तब जीवन में विनम्रता, करुणा और उत्तरदायित्व स्वतः आ जाता है।

यही विभूति योग का उद्देश्य है —
सृष्टि में ईश्वर की निरंतर उपस्थिति को पहचानना।


🕊️ “अहिंसा से लेकर यश–अपयश तक… सब ईश्वर से ही!” भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 5 का गूढ़ रहस्य (विभूति योग)



📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥5॥


🔤 IAST Transliteration

ahiṁsā samatā tuṣṭis tapo dānaṁ yaśo’ yaśaḥ |
bhavanti bhāvā bhūtānāṁ matta eva pṛthag-vidhāḥ ||5||


🪔 हिंदी अनुवाद

अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान,
यश और अपयश —
प्राणियों के ये विविध भाव
मुझसे ही भिन्न-भिन्न रूपों में उत्पन्न होते हैं।


🌍 English Translation

Non-violence, equanimity, contentment, austerity, charity,
fame and infamy —
the diverse states of beings
arise from Me alone in their various forms.


📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या

भगवद गीता अध्याय 10 का यह पाँचवाँ श्लोक मानव जीवन के नैतिक, मानसिक और सामाजिक गुणों का स्रोत स्पष्ट करता है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अहिंसा जैसे उच्च गुण और यश–अपयश जैसे सामाजिक अनुभव — दोनों ही ईश्वर से उत्पन्न होते हैं

यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि कोई भी गुण केवल हमारी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। जब मनुष्य अपने गुणों का श्रेय स्वयं को देता है, तब अहंकार जन्म लेता है; और जब वह उन्हें ईश्वर की देन मानता है, तब विनम्रता।

🔹 अहिंसा (Ahimsa)

केवल शारीरिक हिंसा से बचना ही नहीं,
बल्कि विचार, वाणी और भावना में भी किसी को आहत न करना
भगवान बताते हैं कि अहिंसा स्वाभाविक रूप से उन्हीं की कृपा से आती है।

🔹 समता (Samatā)

सफलता–असफलता, सुख–दुःख में समान भाव।
यह गीता का केंद्रीय संदेश है।

🔹 तुष्टि (Contentment)

आज के उपभोगवादी युग में दुर्लभ गुण।
संतोष ही वास्तविक धन है।

🔹 तप (Tapas)

आत्म-संयम और अनुशासन।
तप शरीर को नहीं, अहंकार को जलाता है

🔹 दान (Dāna)

केवल धन नहीं,
समय, ज्ञान और करुणा का दान भी ईश्वर की प्रेरणा से होता है।

🔹 यश और अयश

मनुष्य अक्सर यश को चाहता है और अपयश से डरता है।
पर भगवान स्पष्ट कहते हैं — दोनों ही क्षणिक हैं
और दोनों का उद्देश्य आत्म-विकास है।

इस श्लोक में “पृथग्विधाः” शब्द बहुत महत्वपूर्ण है —
अर्थात ईश्वर एक ही है, पर उसके भाव जीवों में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होते हैं


📘 Detailed English Explanation

In this verse, Krishna reveals that moral virtues and social outcomes are also manifestations of the Divine.

Qualities like non-violence, contentment, and charity are not random traits; they arise through divine influence shaped by individual nature.

Similarly, fame and infamy are not absolute measures of worth. They are temporary conditions meant to teach detachment.

This verse teaches seekers to:

  • Avoid pride in virtue

  • Avoid despair in disgrace

  • See divine order in all experiences

Everything operates under Krishna’s will, though expressed diversely.


🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)

🔸 हिंदी में

  1. गुणों का श्रेय स्वयं को नहीं, ईश्वर को देना चाहिए

  2. यश और अपयश दोनों अस्थायी हैं

  3. संतोष ही सच्चा सुख है

  4. अहिंसा विचार से शुरू होती है

  5. जीवन की विविधता में भी ईश्वर की एकता है

🔸 In English

  1. Virtues are gifts, not achievements

  2. Fame and infamy are temporary

  3. Contentment leads to peace

  4. Non-violence begins in the mind

  5. Diversity exists within divine unity


🔔 निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 5 हमें यह गहरा सत्य सिखाता है कि
मानव जीवन के सभी गुण, अवस्थाएँ और अनुभव ईश्वर से ही उत्पन्न होते हैं

जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं, तब न अहंकार रहता है, न ही हीनभाव।
जीवन सहज, सरल और संतुलित बन जाता है।

यही विभूति योग की आत्मा है —
हर गुण और हर अनुभव में ईश्वर को देखना।

Wednesday, February 25, 2026

🧠 “आपकी बुद्धि, डर और सुख–दुःख… सब भगवान से आते हैं!” भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 4 का गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य (विभूति योग)



📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥4॥


🔤 IAST Transliteration

buddhir jñānam asammohaḥ kṣamā satyaṁ damaḥ śamaḥ |
sukhaṁ duḥkhaṁ bhavo’bhāvo bhayaṁ cābhayam eva ca ||4||


🪔 हिंदी अनुवाद

बुद्धि, ज्ञान, मोह का अभाव, क्षमा, सत्य,
इंद्रियों का संयम, मन का संयम;
सुख और दुःख, जन्म और मृत्यु,
भय और अभय — ये सभी मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।


🌍 English Translation

Intelligence, knowledge, freedom from delusion,
forgiveness, truthfulness, control of the senses and mind;
pleasure and pain, birth and death,
fear and fearlessness — all these arise from Me alone.


📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या

भगवद गीता अध्याय 10 का यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ भगवान श्रीकृष्ण मानव जीवन के हर मानसिक और भावनात्मक पहलू को अपने से उत्पन्न बताते हैं

इस श्लोक में भगवान केवल आध्यात्मिक गुणों की बात नहीं करते, बल्कि सुख–दुःख, भय–अभय जैसे विरोधी भावों को भी अपने ही स्वरूप से जोड़ते हैं। इसका अर्थ है कि जीवन में जो कुछ भी अनुभव होता है, वह ईश्वर की व्यापक व्यवस्था का हिस्सा है

आइए इन शब्दों को संक्षेप में समझें:

🔹 बुद्धि (Buddhi)

सही-गलत में अंतर करने की शक्ति।
यह केवल शिक्षा से नहीं, बल्कि ईश्वरीय कृपा से विकसित होती है

🔹 ज्ञान (Jnana)

तथ्यों का नहीं, बल्कि सत्य का बोध

🔹 असम्मोह

माया और भ्रम से मुक्त स्थिति।
आज के युग में यह सबसे दुर्लभ गुण है।

🔹 क्षमा और सत्य

ये दोनों उच्च आत्मिक स्तर के लक्षण हैं।
भगवान बताते हैं कि सत्य बोलने और क्षमा करने की शक्ति भी उन्हीं से आती है

🔹 दम और शम

इंद्रियों और मन पर नियंत्रण —
यही योग का वास्तविक अभ्यास है।

🔹 सुख और दुःख

मनुष्य प्रायः सुख को ईश्वर की देन मानता है और दुःख को दोष देता है।
परंतु यहाँ भगवान स्पष्ट करते हैं — दोनों ही मुझसे आते हैं,
क्योंकि दोनों ही आत्म-विकास के साधन हैं।

🔹 भव और अभाव

जन्म और मृत्यु।
भगवान संकेत करते हैं कि मृत्यु अंत नहीं, परिवर्तन है

🔹 भय और अभय

डर और निडरता — दोनों की उत्पत्ति भी ईश्वर से है।
जो ईश्वर को जान लेता है, वही अभय को प्राप्त करता है।

यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जीवन में कुछ भी आकस्मिक नहीं है


📘 Detailed English Explanation

In this verse, Krishna expands His divine manifestations beyond cosmic elements into human psychology and experience.

He declares that:

  • Intelligence and wisdom

  • Moral virtues like forgiveness and truth

  • Mental discipline and self-control

  • Even emotions like fear and courage

—all originate from Him.

This verse removes the false division between “spiritual” and “worldly.” Krishna makes it clear that everything within human experience is governed by the Divine.

Pain is not punishment; pleasure is not reward.
Both are tools for growth and realization.

Understanding this verse helps a seeker accept life with equanimity and surrender.


🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)

🔸 हिंदी में

  1. जीवन की हर परिस्थिति ईश्वर की योजना का भाग है

  2. सुख और दुःख दोनों से सीखना चाहिए

  3. आत्म-नियंत्रण ही सच्चा योग है

  4. भय अज्ञान से आता है, अभय ज्ञान से

  5. जीवन को स्वीकार करना ही आध्यात्मिक परिपक्वता है

🔸 In English

  1. Every experience has divine purpose

  2. Pain and pleasure are both teachers

  3. True yoga is self-mastery

  4. Fear arises from ignorance; fearlessness from knowledge

  5. Acceptance leads to inner peace


🔔 निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 4 हमें यह गहरा सत्य सिखाता है कि
मनुष्य का पूरा आंतरिक संसार — विचार, भावनाएँ, सुख, दुःख — सब ईश्वर से संचालित हैं

जब हम यह समझ लेते हैं, तब शिकायत समाप्त हो जाती है और
समर्पण, शांति और स्थिरता जीवन में प्रवेश करती है

यही विभूति योग की असली शुरुआत है —
ईश्वर को हर अनुभव में देखना।


🌺 “जो मुझे जान लेता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है!” भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 3 का अद्भुत आध्यात्मिक रहस्य (विभूति योग)



📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥3॥


🔤 IAST Transliteration

yo mām ajam anādiṁ ca vetti loka-maheśvaram |
asam-mūḍhaḥ sa martyeṣu sarva-pāpaiḥ pramucyate ||3||


🪔 हिंदी अनुवाद

जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और
समस्त लोकों का महान ईश्वर जानता है,
वह मनुष्यों में मोह से रहित होता है
और सभी पापों से मुक्त हो जाता है।


🌍 English Translation

He who knows Me as unborn, without beginning,
and the Supreme Lord of all worlds,
that undeluded person among mortals
is freed from all sins.


📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या

भगवद गीता अध्याय 10 का यह तीसरा श्लोक आध्यात्मिक ज्ञान का शिखर है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर को सही रूप में जान लेना ही मोक्ष का मार्ग है

भगवान स्वयं अपने स्वरूप की तीन विशेषताएँ बताते हैं:

1️⃣ अजम् (Ajam) – अजन्मा

भगवान का जन्म नहीं होता। वे किसी गर्भ से उत्पन्न नहीं हुए।
अवतार भले ही जन्म जैसा दिखाई दे, पर वह लीला है, बाध्यता नहीं।

2️⃣ अनादि (Anadi) – जिनका कोई प्रारंभ नहीं

भगवान समय से परे हैं।
समय उनके अधीन है, वे समय के अधीन नहीं।

3️⃣ लोकमहेश्वरम् (Loka-Maheshwaram) – समस्त लोकों के स्वामी

सिर्फ पृथ्वी नहीं, बल्कि सभी लोकों—स्वर्ग, पाताल, ब्रह्मलोक—के अधिपति।

जो मनुष्य भगवान को इस स्वरूप में पहचान लेता है, वह “असम्मूढः” कहलाता है—
अर्थात मोह, भ्रम और अज्ञान से मुक्त

यहाँ भगवान स्पष्ट कहते हैं:

ऐसा व्यक्ति सर्वपापैः प्रमुच्यते
यानी वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि उसने कोई पाप किया ही नहीं,
बल्कि यह कि ज्ञान की अग्नि में उसके पाप भस्म हो जाते हैं

यह श्लोक यह भी सिखाता है कि:
👉 ईश्वर को आधा-अधूरा जानना पर्याप्त नहीं
👉 उन्हें परम सत्य के रूप में जानना ही मुक्ति देता है


📘 Detailed English Explanation

This verse reveals the transformative power of true divine knowledge.

Krishna declares that one who understands Him as:

  • Unborn (Ajam)

  • Beginningless (Anadi)

  • Supreme Lord of all worlds (Loka-Maheshwaram)

is no longer deluded by material illusion.

The term “undeluded” is key here. Delusion causes attachment, ego, fear, and sin. Knowledge of Krishna’s supreme nature destroys ignorance at its root.

Krishna does not say “those who worship Me blindly,” but rather:

“Those who truly know Me.”

Such knowledge leads to:

  • Detachment from ego

  • Freedom from karmic bondage

  • Liberation from sin

This verse beautifully unites Jnana (knowledge) and Bhakti (devotion).


🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)

🔸 हिंदी में

  1. ईश्वर को जानना ही सबसे बड़ा पुण्य है

  2. सच्चा ज्ञान मोह को नष्ट करता है

  3. पाप कर्म से नहीं, अज्ञान से उत्पन्न होते हैं

  4. भगवान को सर्वोच्च सत्य मानने से भय समाप्त होता है

  5. ज्ञान और भक्ति साथ-साथ चलती हैं

🔸 In English

  1. True knowledge of God leads to liberation

  2. Ignorance is the root of all sin

  3. Understanding God removes fear and ego

  4. Knowledge and devotion are inseparable

  5. Liberation begins with right understanding


🔔 निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 3 हमें यह अमूल्य सत्य सिखाता है कि
मोक्ष का मार्ग किसी बाहरी कर्म से नहीं, बल्कि सही ज्ञान से शुरू होता है

जो व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण को अजन्मा, अनादि और समस्त लोकों का स्वामी मान लेता है,
वह जीवन के भ्रमों से ऊपर उठ जाता है।

ऐसा व्यक्ति न केवल आध्यात्मिक रूप से उन्नत होता है,
बल्कि कर्मों के बंधन और पापों से भी मुक्त हो जाता है

यही विभूति योग का सार है।

🌍 “सृष्टि के मूल में कौन है? ऋषि, मनु और मानव जाति का रहस्य!” भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 6 का गूढ़ अर्थ (विभूति योग)

📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी) महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥6॥ 🔤 IAST Transliteration maha...