श्लोक 13
🕉️ संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
शुचिर्दाक्ष्य उदासीनो गतव्यथः समाचरन् ।
सर्वारम्भपरित्यागी यत्तु मद्भक्तिः स मे प्रियः ॥13॥
🔤 IAST Transliteration
śucir dākṣya udāsīno gatavyathaḥ samācaran |
sarvārambha-parityāgī yattu mad-bhaktiḥ sa me priyaḥ ||13||
🇮🇳 हिंदी अनुवाद
जो व्यक्ति शुद्ध, दक्ष और उदासीन है,
जो सभी प्रकार के प्रारंभों और मोह से परे है, और मेरे प्रति भक्ति करता है, वह मेरे प्रिय है।
🇬🇧 English Translation
One who is pure, skillful, and indifferent to worldly disturbances,
renouncing all undertakings and devoted to Me, is dear to Me.
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या
श्लोक 13 में श्रीकृष्ण ने सच्ची भक्ति और सात्विक जीवनशैली के लक्षण बताए हैं।
यह श्लोक बताता है कि ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति केवल कर्म की मात्रा से नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र और मानसिक स्थिति से मापी जाती है।
1️⃣ शुद्ध और दक्ष
शुद्ध (śucir): कर्म और विचार में निष्कलंक, पवित्र और अहंकार रहित
दक्ष (dākṣya): योग्य, सक्षम और निपुण
व्यक्ति अपने कर्मों और निर्णयों में समझदारी और कौशल का प्रदर्शन करता है
2️⃣ उदासीन और गतव्यथ
उदासीन (udāsīna): किसी भी प्रकार के सुख-दुःख या संसारिक उतार-चढ़ाव से प्रभावित न होना
गतव्यथ (gatavyathaḥ): मानसिक स्थिरता बनाए रखना, दुःख या बाधाओं से विचलित न होना
3️⃣ सर्वारम्भपरित्यागी
सभी प्रकार के असत्य और मोहपूर्ण प्रारंभों का त्याग करना
कर्म करते समय स्वार्थ, लालच और आसक्ति से दूर रहना
4️⃣ मद्भक्ति — परम प्रिय
ऐसा व्यक्ति मेरी (भगवान की) भक्ति में स्थिर है,
उसके सभी कर्म और मानसिक स्थितियाँ सात्विक और पुण्यकारी हैं
यही भगवान को प्रिय होता है और मोक्ष की दिशा में अग्रसर करता है।
🔑 श्लोक का संदेश
सच्ची भक्ति शुद्धता, दक्षता और मानसिक स्थिरता पर निर्भर करती है।
संसारिक मोह, स्वार्थ और अस्थिरता से बचना आवश्यक है।
जो व्यक्ति सर्वारम्भों और मोह से ऊपर उठकर भक्ति करता है, वही भगवान को प्रिय है।
🌍 Detailed English Explanation
Verse 13 emphasizes the qualities of a devotee dear to God:
Pure (śucir): Free from selfishness and ego, with pure intentions
Skillful (dākṣya): Capable and competent in actions
Indifferent (udāsīna) to worldly disturbances: Remains mentally stable despite challenges
Renouncing worldly undertakings (sarvārambha-parityāgī): Avoids selfish and attachment-based actions
Devoted to God (mad-bhakti): Actions and mind are aligned with divine love
Krishna teaches that true devotion is measured by character, intent, and detachment, not mere ritual performance.
🌱 जीवन के लिए सीख (Life Lessons)
✅ हिंदी में
शुद्ध, दक्ष और मानसिक रूप से स्थिर बनें
संसारिक मोह और स्वार्थ से ऊपर उठें
सभी प्रारंभों और कर्मों में निष्काम भाव रखें
सच्ची भक्ति भगवान को प्रिय होती है और मोक्ष की ओर ले जाती है
✅ In English
Be pure, skillful, and mentally stable
Rise above worldly attachments and selfishness
Approach all actions with selflessness and devotion
True devotion is dear to God and leads to liberation
🕯️ निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 13 यह स्पष्ट करता है कि भगवान को प्रिय वही है जो शुद्ध, दक्ष और स्थिर भाव से भक्ति करता है, और संसारिक मोह से दूर रहता है।
श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि सच्ची भक्ति केवल कर्म और पूजा का नाम नहीं, बल्कि चरित्र, मानसिक स्थिरता और निष्काम भाव का परिणाम है।
🌸 शुद्ध और दक्ष बनें, मोह से दूर रहें, और भगवान की भक्ति में स्थिर रहें।