Saturday, July 25, 2026

🔱 असक्त बुद्धि और संन्यास: नैष्कर्म्य की प्राप्ति | भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 49 का अर्थ



📜 संस्कृत श्लोक (Devanagari)

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥49॥


🔤 IAST Transliteration

asakta-buddhiḥ sarvatra jitātmā vigata-spṛhaḥ |
naiṣkarmya-siddhiṃ paramāṃ saṃnyāseṇa adhigacchati || 18.49 ||


🪔 हिंदी अनुवाद

जो व्यक्ति सर्वत्र निर्लिप्त बुद्धि वाला, आत्मा पर विजय प्राप्त और इच्छाओं से मुक्त है,
वह नैष्कर्म्य (कर्म से मुक्ति) की परम सिद्धि को संन्यास (त्याग) द्वारा प्राप्त करता है।


🌍 English Translation

A person who is detached in intellect, self-controlled, and free from desires,
attains the highest perfection of inaction (Nishkarmya) through renunciation (Sannyasa).


🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या (Detailed Hindi Explanation)

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण संन्यास और नैष्कर्म्य सिद्धि का सार स्पष्ट कर रहे हैं।

🔸 “असक्तबुद्धिः सर्वत्र”

  • असक्तबुद्धि: विचारों और कर्मों में संलग्न न होने वाली बुद्धि

  • व्यक्ति अपने कर्मों और परिणामों से असक्त होता है, यानी लाभ या हानि की चिंता नहीं करता

🔸 “जितात्मा विगतस्पृहः”

  • जितात्मा: जिसने अपनी आत्मा पर विजय प्राप्त की

  • विगतस्पृह: जिसने सांसारिक इच्छाओं और लालसाओं को त्याग दिया

  • ऐसे व्यक्ति का मन शांति और संतुलन में स्थिर रहता है

🔸 “नैष्कर्म्यसिद्धि”

  • नैष्कर्म्य: कर्म से मुक्ति और मानसिक शांति

  • सिद्धि: पूर्ण सफलता और आत्मिक आनंद

  • इसका अर्थ: जब व्यक्ति अपने कर्म को संन्यासी भाव से करता है, तो वह नैष्कर्म्य की अवस्था प्राप्त करता है।

🔸 आधुनिक जीवन में संदेश

आज:

  • लोग कर्म और फल के लिए चिंतित रहते हैं

  • गीता सिखाती है कि निर्लिप्त भाव से कर्म करना और परिणाम पर आसक्ति न रखना

  • यही मानसिक शांति, संतोष और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है

यह श्लोक संपूर्ण कर्मयोग और संन्यासयोग का सार बताता है।


🌱 Detailed English Explanation

This verse explains the highest attainment through detachment and renunciation.

🔹 Key Points

  1. Detached intellect (Asakta Buddhi)

    • One who does not cling to outcomes of actions

  2. Self-mastery (Jitatma) and freedom from desire (Vigatasprih)

    • A person who controls the mind and senses, free from worldly cravings

  3. Attainment of Nishkarmya

    • True inaction is achieved not by inactivity but by performing duties without attachment

    • Such renunciation leads to spiritual perfection and inner peace

🔹 Modern Relevance

  • Many people worry about results and success

  • Gita teaches: perform duties with detachment

  • Detachment brings:

    • Inner calm

    • Clarity of mind

    • Spiritual progress


🌼 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)

🪔 हिंदी जीवन-पाठ

  1. निर्लिप्त भाव से कर्म करें

    • परिणाम की चिंता किए बिना कर्म में लगन रखें।

  2. इच्छाओं और लालसाओं का त्याग

    • सांसारिक इच्छाओं से मुक्त होने पर मानसिक शांति मिलती है।

  3. संन्यास का अर्थ

    • संन्यास केवल शरीर को त्यागना नहीं, बल्कि मन और बुद्धि का त्याग भी है।

  4. आध्यात्मिक सिद्धि

    • नैष्कर्म्य की प्राप्ति से आत्मा का परिपूर्ण आनंद और संतोष मिलता है।

  5. संपूर्ण जीवन में संतुलन

    • कर्म और त्याग का संतुलन जीवन को उद्देश्यपूर्ण और शांतिपूर्ण बनाता है।


🌿 English Life Lessons

  1. Perform duties with detachment

    • Engage in work without anxiety for results.

  2. Renounce desires

    • Freedom from worldly cravings brings peace.

  3. Meaning of Sannyasa

    • True renunciation is mental and intellectual, not just physical.

  4. Spiritual perfection

    • Nishkarmya leads to ultimate inner joy and contentment.

  5. Balance in life

    • Harmonizing duty and detachment creates a meaningful and peaceful life.


🔔 आधुनिक जीवन में श्लोक 18.49 की प्रासंगिकता

आज के समय में:

  • लोग अक्सर लाभ और सफलता के लिए चिंतित रहते हैं

  • गीता सिखाती है कि निर्लिप्त भाव से कर्म करना ही मानसिक शांति और सिद्धि का मार्ग है

  • जीवन में संतोष और स्थिरता तब आती है जब हम संन्यासयोग और कर्मयोग को अपनाते हैं

गीता का संदेश है:

असक्त बुद्धि और संन्यास के माध्यम से नैष्कर्म्य सिद्धि प्राप्त होती है।


🧘‍♂️ निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि:

  • कर्म में असक्ति और मानसिक विजय आवश्यक है

  • इच्छाओं और फल की लालसा त्यागने से नैष्कर्म्य और मानसिक शांति मिलती है

  • संन्यास का वास्तविक अर्थ है मन, बुद्धि और आत्मा का त्याग, जिससे व्यक्ति परम सिद्धि प्राप्त करता है

जो व्यक्ति अपने कर्म में निर्लिप्त, इच्छाओं से मुक्त और आत्मा पर विजय प्राप्त है, वही नैष्कर्म्य और परम सिद्धि प्राप्त करता है।


🔱 सहज कर्म का पालन: दोष से भय न | भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 48 का अर्थ

📜 संस्कृत श्लोक (Devanagari)

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥48॥


🔤 IAST Transliteration

sahajaṃ karma kaunteya sadoṣam api na tyajet |
sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnirivāvṛtāḥ || 18.48 ||


🪔 हिंदी अनुवाद

हे कौन्तेय (अर्जुन), सहज और स्वाभाविक कर्म को दोष होने पर भी त्याग नहीं करना चाहिए।
सभी प्रारंभिक प्रयास दोषों से घिरे होते हैं, जैसे आग को धुआँ ढक लेता है।


🌍 English Translation

O Kaunteya (Arjuna), one should never abandon natural and innate duties, even if they are imperfect.
All endeavors are inherently flawed, like smoke covering a fire.


🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या (Detailed Hindi Explanation)

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में सहज कर्म और दोष का महत्व स्पष्ट करते हैं।

🔸 सहज कर्म

  • सहज कर्म: जो कर्म स्वभाव, गुण और योग्यता के अनुसार सहज रूप से किए जाते हैं

  • ये कर्म व्यक्ति की प्राकृतिक प्रवृत्ति और क्षमताओं के अनुसार होते हैं

  • इन कर्मों को त्यागना उचित नहीं है, भले ही उनमें कुछ दोष या कमियाँ हों

🔸 दोष का सामान्य होना

  • सर्वारम्भा हि दोषेण: हर प्रारंभ में दोष या त्रुटियाँ स्वाभाविक हैं

  • जैसे आग को धुआँ ढक लेता है, वैसे ही सभी कर्म प्रारंभ में अपूर्ण या दोषपूर्ण हो सकते हैं

  • इसका अर्थ: दोष के कारण अपने कर्म को त्यागना गलत है

🔸 आधुनिक जीवन में संदेश

आज:

  • लोग अक्सर अपनी कमजोरियों या असफलताओं के कारण प्रयास छोड़ देते हैं

  • गीता सिखाती है कि प्रारंभिक दोषों के बावजूद कर्म जारी रखें

  • यह लगन, धैर्य और अनुभव से सिद्धि का मार्ग है

यह श्लोक कर्मयोग और मानसिक दृढ़ता का महत्वपूर्ण संदेश देता है।


🌱 Detailed English Explanation

Lord Krishna emphasizes the importance of performing natural duties despite imperfections.

🔹 Key Points

  1. Sahaja Karma (Natural Duties)

    • Actions aligned with one’s nature, qualities, and abilities

    • These should never be abandoned, even if imperfect

  2. Inherent flaws in all beginnings

    • Like smoke covering fire, initial efforts may have defects

    • Imperfections are natural and should not discourage action

  3. Modern Relevance

    • People often give up due to initial failures or lack of skill

    • Gita teaches: persevere in your duties and learn through practice

    • Dedication and patience transform flawed efforts into excellence


🌼 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)

🪔 हिंदी जीवन-पाठ

  1. अपने सहज कर्म को छोड़ें नहीं

    • जो काम आपके गुण और स्वभाव के अनुसार सहज हैं, उन्हें लगातार करें।

  2. दोष स्वाभाविक हैं

    • किसी भी नए प्रयास में त्रुटियाँ होना सामान्य है।

  3. परिश्रम और अनुभव से सुधार

    • दोषों के बावजूद प्रयास जारी रखने से कौशल और सिद्धि आती है।

  4. धैर्य और निष्ठा

    • प्रारंभिक असफलताओं से निराश न हों, कर्मयोग की भावना बनाए रखें।

  5. सफलता की कुंजी

    • निरंतर प्रयास और कर्म में लगन ही अंतिम सफलता दिलाती है।


🌿 English Life Lessons

  1. Do not abandon natural duties

    • Perform actions aligned with your qualities consistently.

  2. Imperfections are natural

    • Initial efforts often contain flaws.

  3. Improvement through effort

    • Persistence transforms imperfect actions into excellence.

  4. Patience and dedication

    • Do not be discouraged by early failures; maintain a spirit of Karma Yoga.

  5. Key to success

    • Continuous effort and devotion lead to ultimate success.


🔔 आधुनिक जीवन में श्लोक 18.48 की प्रासंगिकता

आज के समय में:

  • लोग अक्सर प्रारंभिक असफलताओं के कारण अपने करियर या व्यवसाय छोड़ देते हैं

  • गीता सिखाती है कि प्राकृतिक कर्मों को दोष के बावजूद जारी रखें

  • इस दृष्टिकोण से जीवन में:

    • धैर्य बढ़ता है

    • कौशल विकसित होता है

    • दीर्घकालिक सफलता मिलती है

गीता सिखाती है कि:

सहज कर्मों का त्याग न करें, प्रारंभिक दोष सामान्य हैं, प्रयास जारी रखें।


🧘‍♂️ निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि:

  • सहज और स्वभावानुसार कर्म का त्याग न करें, भले ही उसमें दोष हो

  • प्रारंभिक असफलताएँ और कमियाँ स्वाभाविक हैं

  • लगातार प्रयास और निष्ठा से दोष दूर होते हैं और कर्म सिद्धि प्राप्त होती है

जो व्यक्ति अपने सहज कर्म में निष्ठा रखता है और प्रारंभिक दोषों से निराश नहीं होता, वही सच्ची सफलता और आत्मिक उन्नति प्राप्त करता है।

Friday, July 24, 2026

🔱 स्वधर्म का पालन: दूसरों के धर्म से श्रेष्ठता | भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 47 का अर्थ

 


📜 संस्कृत श्लोक (Devanagari)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥47॥


🔤 IAST Transliteration

śreyān sva-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣṭhitāt |
svabhāva-niyataṃ karma kurvann āpnoti kilbiṣam || 18.47 ||


🪔 हिंदी अनुवाद

अपना स्वधर्म (अपने स्वभाव और कर्तव्य) निभाना किसी और के धर्म को निभाने से बेहतर है।
जो व्यक्ति अपने स्वभाव अनुसार कर्म करता है, वह पाप या दोष से मुक्त रहता है।


🌍 English Translation

One’s own duty, even if imperfectly performed, is better than performing another’s duty perfectly.
By performing actions according to one’s nature, a person avoids sin and attains righteousness.


🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या (Detailed Hindi Explanation)

यह श्लोक गीता का एक बहुत महत्वपूर्ण संदेश है: स्वधर्म का पालन सर्वोत्तम है।

🔸 “श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः”

  • स्वधर्म: व्यक्ति के गुण, स्वभाव और योग्यता के अनुसार कर्तव्य

  • विगुणः: भले ही वह कर्म पूर्ण या उत्कृष्ट न हो

  • इसका अर्थ: अपने कर्तव्य का पालन करना हमेशा दूसरों के धर्म से श्रेष्ठ है, चाहे वह अन्य धर्म अधिक कठिन या उत्कृष्ट क्यों न लगे

🔸 “परधर्मात्स्वनुष्ठितात्”

  • परधर्म: किसी और का धर्म या कर्तव्य

  • इसे निभाने में व्यक्ति असफल हो सकता है क्योंकि यह उसके स्वभाव और गुणों के अनुकूल नहीं है

  • ऐसे कार्य करने में मानसिक तनाव और दोष लग सकते हैं

🔸 “स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्”

  • स्वभावनियत कर्म: अपने गुण और स्वभाव के अनुसार किया गया कर्म

  • इससे व्यक्ति किल्बिष (पाप, दोष) से मुक्त रहता है

  • यह कर्मयोग और आत्मिक प्रगति का मार्ग है

🔸 आधुनिक जीवन में संदेश

आज:

  • लोग दूसरों की तुलना में अपने जीवन को आकार देने की कोशिश करते हैं

  • यह श्लोक हमें सिखाता है कि अपना मार्ग और कर्तव्य अपनाएँ, दूसरों की नकल या उनके कर्म की तुलना में

  • इससे जीवन में संतोष, सफलता और नैतिक स्थिरता मिलती है


🌱 Detailed English Explanation

This verse emphasizes the supremacy of performing one’s own duties (Swadharma).

🔹 Key Points

  1. Swadharma (one’s own duty): Duties aligned with personal qualities, nature, and abilities

  2. Even if imperfect: Imperfectly performed self-duty is better than perfectly performing another’s duty

  3. Avoiding sin: Acting according to one’s nature prevents errors, guilt, or ethical misalignment

🔹 Modern Relevance

  • Many people attempt roles or responsibilities not aligned with their strengths

  • Gita teaches: focus on your own responsibilities and strengths

  • This leads to:

    • Satisfaction

    • Ethical conduct

    • Personal and professional success


🌼 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)

🪔 हिंदी जीवन-पाठ

  1. अपना स्वधर्म निभाएँ
    अपने गुण और योग्यता के अनुसार कर्म करना सर्वोत्तम है।

  2. दूसरों के धर्म की नकल न करें
    दूसरों के कार्यों की तुलना करने से मानसिक असंतोष और गलत निर्णय हो सकते हैं।

  3. संतोष और नैतिकता
    स्वधर्म का पालन करने से व्यक्ति मानसिक और नैतिक रूप से स्थिर रहता है।

  4. सफलता का मार्ग
    सफलता उन्हीं को मिलती है जो अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करते हैं।

  5. कर्मयोग और आत्मिक प्रगति
    अपने कर्म को अपने स्वभाव के अनुसार करना आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।


🌿 English Life Lessons

  1. Follow your own duty
    Acting according to your nature and abilities is always superior.

  2. Avoid imitating others
    Comparing or copying others can cause dissatisfaction and mistakes.

  3. Inner satisfaction and morality
    Swadharma ensures ethical and mental stability.

  4. Path to success
    True success comes to those who perform duties aligned with their nature.

  5. Karma Yoga and spiritual progress
    Performing duties according to one’s nature fosters spiritual growth.


🔔 आधुनिक जीवन में श्लोक 18.47 की प्रासंगिकता

आज के समय में:

  • करियर, पेशा और व्यक्तिगत जीवन में लोग अक्सर दूसरों के रास्ते अपनाने की कोशिश करते हैं

  • गीता का यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि अपना मार्ग चुनें और उसमें निष्ठा रखें

  • यह दृष्टिकोण जीवन में संतुलन, स्थिरता और सफलता लाता है

गीता सिखाती है कि:

अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करना, किसी अन्य के मार्ग से बेहतर है।


🧘‍♂️ निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि:

  • स्वधर्म का पालन सर्वोत्तम है, चाहे वह कर्म पूर्ण न भी हो

  • दूसरों के धर्म का अनुकरण करने से पाप और असफलता का खतरा रहता है

  • अपने स्वभाव और गुणों के अनुसार कर्म करना सिद्धि, संतोष और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है

जो व्यक्ति अपने स्वधर्म में संलग्न रहता है, वही जीवन में स्थिरता, सफलता और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करता है।


🔱 अपने कर्म के माध्यम से ईश्वर को पूजना | भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 46 का अर्थ



📜 संस्कृत श्लोक (Devanagari)

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥46॥


🔤 IAST Transliteration

yataḥ pravṛttir bhūtānāṃ yena sarvam idaṃ tatam |
sva-karmaṇā tam abhyarcya siddhiṃ vindati mānavaḥ || 18.46 ||


🪔 हिंदी अनुवाद

जो कारण है कि समस्त प्राणी अस्तित्व में हैं,
उस कारण (ईश्वर) को व्यक्ति अपने स्वकर्म के माध्यम से पूजकर सिद्धि प्राप्त करता है।


🌍 English Translation

By performing one’s own duties and offering them to the cause
from which all beings originate, a person attains perfection.
This ultimate source is God.


🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या (Detailed Hindi Explanation)

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्वकर्म के माध्यम से ईश्वर की भक्ति और सिद्धि प्राप्ति का रहस्य बताते हैं।

🔸 “यतः प्रवृत्तिः” — ईश्वर का सर्वस्रोत

  • यतः प्रवृत्तिः: वह कारण जिससे सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न हुई

  • यह ईश्वर या परमात्मा है, जो सभी जीवों और कर्मों का मूल है

  • प्रत्येक कर्म का सही लक्ष्य है इस सर्वशक्तिमान स्रोत की पूजा

🔸 “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य” — अपने कर्म के माध्यम से पूजा

  • व्यक्ति अपने कर्तव्य और स्वभाव के अनुसार कर्म करता है

  • उन कर्मों को ईश्वर को अर्पित करने से सिद्धि, शांति और आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है

  • यह दृष्टिकोण गीता के कर्मयोग का सार है:

    कर्म करें, पर फल की चिंता न करें, और उसे ईश्वर को समर्पित करें

🔸 “सिद्धिं विन्दति मानवः” — पूर्ण सफलता

  • सिद्धि का अर्थ है:

    • कर्म में उत्कृष्टता

    • मानसिक संतोष

    • आध्यात्मिक प्रगति

  • जब व्यक्ति अपने कर्म को ईश्वर के प्रति भक्ति और समर्पण के साथ करता है, तो वह पूर्ण सिद्धि प्राप्त करता है

🔸 आधुनिक जीवन में संदेश

आज:

  • लोग अक्सर सफलता और उपलब्धि के पीछे भागते हैं

  • गीता सिखाती है कि सच्ची सफलता स्वकर्म और ईश्वर भक्ति में है

  • हर कार्य को ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से करना जीवन में स्थिरता और संतोष लाता है


🌱 Detailed English Explanation

Lord Krishna explains the ultimate purpose of performing duties in this verse.

🔹 “Yatah Pravrittih” — The Source of All Beings

  • The origin of all existence and beings

  • God as the ultimate source of creation and sustenance

  • Recognizing this source is essential for spiritual growth

🔹 “Sva-karma Abhyarcya” — Worship through One’s Own Duties

  • Devotion is expressed through one’s own work

  • Offering work to God ensures:

    • Excellence in action

    • Inner satisfaction

    • Spiritual progress

This is the essence of Karma Yoga: Act with devotion, not attachment to results.

🔹 “Siddhim Vindati” — Attainment of Perfection

  • Success and perfection arise when:

    • Actions are aligned with one’s nature

    • Work is performed with dedication and devotion

    • Results are surrendered to God


🌼 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)

🪔 हिंदी जीवन-पाठ

  1. कर्म को ईश्वर को समर्पित करें
    यही वास्तविक सिद्धि का मार्ग है।

  2. स्वकर्म और स्वगुण का पालन करें
    केवल अपने गुणों के अनुसार किए गए कार्य ही संतोष और सफलता देते हैं।

  3. फल की चिंता न करें
    कर्म का उद्देश्य सत्य और भक्ति होना चाहिए, न कि केवल परिणाम।

  4. संतुलित जीवन
    अपने कर्मों के माध्यम से आध्यात्मिक और भौतिक जीवन दोनों में सफलता पाएँ।

  5. भक्ति और कर्म का संगम
    कार्य और ईश्वर की भक्ति का संयोजन जीवन को सार्थक बनाता है।


🌿 English Life Lessons

  1. Offer your work to God
    This is the path to true perfection.

  2. Follow your own duties and nature
    Actions aligned with one’s qualities bring satisfaction and success.

  3. Do not worry about the result
    Focus on righteousness and devotion, not merely outcomes.

  4. Balanced life
    Achieve spiritual and worldly success through dedicated action.

  5. Integration of devotion and work
    Combining work with devotion gives life meaning and purpose.


🔔 आधुनिक जीवन में श्लोक 18.46 की प्रासंगिकता

आज के समय में:

  • पेशेवर और छात्र अपने कार्य को केवल परिणाम के लिए नहीं, बल्कि सच्ची निष्ठा और भक्ति के साथ करें

  • हर कर्म को ईश्वर को अर्पित भाव से करना मानसिक शांति और संतुलन देता है

  • यह दृष्टिकोण जीवन को धार्मिक, व्यावहारिक और उद्देश्यपूर्ण बनाता है

गीता सिखाती है कि:

सफलता और सिद्धि केवल कर्म और भक्ति के संयोग से प्राप्त होती है।


🧘‍♂️ निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि:

  • सभी कर्म स्वकर्म और स्वभाव के अनुसार किए जाने चाहिए

  • कर्म को ईश्वर को अर्पित करके करना ही सच्ची सिद्धि और संतोष का मार्ग है

  • फल की चिंता किए बिना कर्म करना और उसे भक्ति भाव से करना जीवन को पूर्णता प्रदान करता है

जो अपने कर्म को ईश्वर को समर्पित कर करता है, वही सच्ची सफलता और आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त करता है।

🔱 असक्त बुद्धि और संन्यास: नैष्कर्म्य की प्राप्ति | भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 49 का अर्थ

📜 संस्कृत श्लोक (Devanagari) असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥49॥ 🔤 IAST Translitera...