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Friday, May 29, 2026

🕊️ कौन पाता है अविनाशी परम पद? अहंकार और मोह से परे जीवन का रहस्य – भगवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 5

📜 संस्कृत श्लोक (Devanagari)

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः
गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥5॥


🔤 IAST Transliteration

nirmāna-mohā jita-saṅga-doṣā
adhyātma-nityā vinivṛtta-kāmāḥ |
dvandvair vimuktāḥ sukha-duḥkha-saṁjñaiḥ
gacchanty amūḍhāḥ padam avyayaṁ tat ||5||


🇮🇳 हिंदी अनुवाद

जो अहंकार और मोह से रहित हैं,
जिन्होंने संग (आसक्ति) के दोष को जीत लिया है,
जो सदा अध्यात्म में स्थित रहते हैं,
जिनकी कामनाएँ पूर्णतः निवृत्त हो चुकी हैं,
जो सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त हो गए हैं —
ऐसे अमूढ़ (ज्ञानी) पुरुष उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।


🇬🇧 English Translation

Those who are free from pride and delusion,
who have conquered the evil of attachment,
who are ever established in the Self,
whose desires have completely ceased,
and who are liberated from the dualities of pleasure and pain—
such undeluded beings attain that eternal, imperishable abode.


🕉️ विस्तृत हिंदी व्याख्या (Detailed Hindi Explanation)

पिछले श्लोक (15.4) में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि संसार-वृक्ष को काटने के बाद परम पद की खोज करनी चाहिए।
अब श्लोक 5 में वे स्पष्ट करते हैं कि:

👉 उस परम पद को कौन प्राप्त करता है?
👉 उसकी योग्यताएँ क्या हैं?

यह श्लोक साधक की आंतरिक स्थिति का पूर्ण वर्णन है।


🔹 “निर्मानमोहाः” – अहंकार और मोह का त्याग

  • मान = अहंकार, मैं-भाव

  • मोह = मिथ्या आसक्ति, भ्रम

जो व्यक्ति:

  • स्वयं को कर्ता नहीं मानता

  • शरीर, पद, धन से अपनी पहचान नहीं बनाता

वही निर्मानमोह कहलाता है।

📌 जब तक “मैं” और “मेरा” है,
तब तक मुक्ति संभव नहीं।


🔹 “जितसङ्गदोषाः” – आसक्ति पर विजय

संग का अर्थ:

  • लोगों से नहीं,

  • बल्कि निर्भरता और चिपकाव से है।

संग दोष:

  • भय देता है

  • अपेक्षा देता है

  • दुःख देता है

जिसने:
✔ संग को समझ लिया
✔ और उससे ऊपर उठ गया

वही इस मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।


🔹 “अध्यात्मनित्या” – सदा आत्मचिंतन में स्थित

यह अत्यंत महत्वपूर्ण गुण है।

अध्यात्मनित्य का अर्थ:

  • रोज पूजा करना नहीं

  • बल्कि हर क्षण आत्म-स्मृति में जीना

ऐसा व्यक्ति:

  • परिस्थितियों में नहीं बहता

  • भीतर टिके रहता है


🔹 “विनिवृत्तकामाः” – इच्छाओं का पूर्ण अंत

कामना:

  • बंधन की जड़ है

  • पुनर्जन्म का कारण है

यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं:
👉 केवल नियंत्रित कामना नहीं
👉 बल्कि निवृत्त (समाप्त) कामना

जब आत्मा पूर्ण हो जाती है,
तो चाह अपने-आप समाप्त हो जाती है।


🔹 “द्वन्द्वैर्विमुक्ताः” – सुख-दुःख से परे

संसार द्वन्द्वों पर टिका है:

  • सुख–दुःख

  • लाभ–हानि

  • मान–अपमान

ज्ञानी व्यक्ति:

  • सुख में फूले नहीं

  • दुःख में टूटे नहीं

क्योंकि वह जानता है:
👉 मैं अनुभव नहीं, द्रष्टा हूँ।


🔹 “अमूढाः” – भ्रम से मुक्त ज्ञानी

अमूढ़ वह है:

  • जो सत्य जानता है

  • जो माया में नहीं उलझता

  • जो लक्ष्य को नहीं भूलता

ऐसे ही लोग:

पदमव्ययं तत्
अर्थात् अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।


🌍 Detailed English Explanation

Verse 15.5 describes the inner qualifications of a liberated soul.

Krishna explains that liberation is not accidental—it requires inner purification.


🔹 Freedom from Pride and Delusion

Pride and delusion bind the soul to identity and ego.
A liberated person sees himself as the Self, not the body.


🔹 Victory Over Attachment

Attachment creates dependence and suffering.
Freedom comes when attachment dissolves.


🔹 Constant Abidance in the Self

True spirituality is not ritualistic—it is continuous awareness.


🔹 End of Desire

Desire ends when completeness is realized.
This marks true freedom.


🔹 Beyond Dualities

The wise remain balanced in pleasure and pain.
They are observers, not victims.


🔹 Attainment of the Imperishable Abode

Such undeluded beings alone reach the eternal state, beyond rebirth.


🌱 जीवन के महत्वपूर्ण पाठ (Life Lessons)

🇮🇳 हिंदी में जीवन सीख

  1. अहंकार और मोह सबसे बड़े बंधन हैं

  2. आसक्ति नहीं, जागरूकता चाहिए

  3. इच्छाओं का अंत ही मुक्ति है

  4. सुख-दुःख से ऊपर उठना आवश्यक है

  5. ज्ञानी वही है जो भ्रम से मुक्त हो


🇬🇧 Life Lessons in English

  1. Ego and delusion bind the soul

  2. Attachment causes suffering

  3. Freedom comes when desires end

  4. Rise above pleasure and pain

  5. Clarity leads to liberation


🧘 निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद्गीता अध्याय 15 का यह पाँचवाँ श्लोक
हमें मुक्त मानव का सजीव चित्र दिखाता है।

यह मार्ग:

  • बाहरी त्याग का नहीं

  • बल्कि आंतरिक रूपांतरण का है।

जब मनुष्य:

  • अहंकार छोड़ देता है

  • इच्छाओं से मुक्त हो जाता है

  • आत्मा में स्थित हो जाता है

तब वह:
✨ अविनाशी परम पद को प्राप्त करता है।

🔱 ज्ञान, भक्ति और धर्म का अंतिम संदेश | भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 78 का अर्थ

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