श्लोक 18
🕉️ संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥18॥
🔤 IAST Transliteration
ahaṁkāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ ca sanśritāḥ |
mā-mātma-paradeheṣu pradviṣanto'bhyasūyakāḥ ||18||
🇮🇳 हिंदी अनुवाद
जो लोग अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध में लिप्त रहते हैं,
और दूसरों के शरीर और आत्मा में मुझमें देखते हुए भी द्वेष और ईर्ष्या रखते हैं।
🇬🇧 English Translation
Those who are attached to ego, strength, pride, desire, and anger,
and who, even recognizing Me in themselves and others, harbor hatred and envy,
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या
श्लोक 18 में श्रीकृष्ण ने आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों के अहंकार, क्रोध और द्वेष को स्पष्ट किया है।
यह श्लोक बताता है कि अहंकार और क्रोध से भरा मन व्यक्ति को किस प्रकार विनाशकारी और असंयमी बनाता है।
1️⃣ अहंकारं बलं दर्पं — अहंकार और गर्व
व्यक्ति अपने बल और शक्ति को अपना अधिकार मानता है।
अहंकार और दर्प उसे सत्य और नैतिकता से दूर कर देते हैं।
2️⃣ कामं क्रोधं च संश्रिताः — इच्छाओं और क्रोध में लिप्त
काम और क्रोध के लिए वह अपने जीवन को समर्पित कर देता है।
यह उसे दूसरों के प्रति हिंसक और द्वेषपूर्ण बना देता है।
3️⃣ मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः — द्वेष और ईर्ष्या
वह दूसरों में और स्वयं में ईश्वर और आत्मा के रूप को देखकर भी द्वेष और ईर्ष्या करता है।
यह अहंकार और लोभ का चरम रूप है।
परिणामस्वरूप, व्यक्ति सामाजिक और आत्मिक दृष्टि से पतित हो जाता है।
🔑 श्लोक का संदेश
श्रीकृष्ण इस श्लोक में चेतावनी देते हैं कि अहंकार, क्रोध, काम और ईर्ष्या:
मन और कर्म को अशुद्ध और असंयमी बनाते हैं
दूसरों के साथ और स्वयं के भीतर शांति और नैतिकता को नष्ट करते हैं
इसे छोड़कर ही दैवी गुण, संयम और मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है
🌍 Detailed English Explanation
Verse 18 explains the destructive nature of ego, desire, anger, and envy:
Individuals attached to ego, pride, and personal strength become blind to dharma.
Desire and anger dominate their mind, making them hostile and jealous toward others.
Krishna warns that even seeing the divine in oneself and others does not prevent envy if the mind is bound by demonic traits.
This shloka teaches that control of ego, desires, anger, and envy is essential for spiritual growth and ethical living.
🌱 जीवन के लिए सीख (Life Lessons)
✅ हिंदी में
अहंकार, क्रोध और द्वेष जीवन को पतन की ओर ले जाते हैं
दूसरों में और स्वयं में ईश्वर देखने के बावजूद ईर्ष्या करना आत्मा के लिए हानिकारक है
संयम, दैवी दृष्टि और अहंकार रहित जीवन अपनाना आवश्यक है
सच्चा सुख और मोक्ष केवल इन दोषों का परित्याग करने से प्राप्त होता है
✅ In English
Ego, anger, and envy lead life toward downfall
Jealousy, even while seeing divinity in oneself and others, is harmful
Discipline, divine vision, and an ego-free life are essential
True happiness and liberation come from abandoning these faults
🕯️ निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 18 यह स्पष्ट करता है कि अहंकार, क्रोध, काम और द्वेष आसुरी प्रवृत्ति के मूल लक्षण हैं।
श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि दैवी दृष्टि, संयम और विवेक अपनाकर ही जीवन में स्थायी सुख और मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
🌸 अहंकार, क्रोध और द्वेष से मुक्त हों—सच्चे जीवन और मोक्ष की ओर बढ़ें।
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