📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥3॥
🔤 IAST Transliteration
yo mām ajam anādiṁ ca vetti loka-maheśvaram |
asam-mūḍhaḥ sa martyeṣu sarva-pāpaiḥ pramucyate ||3||
🪔 हिंदी अनुवाद
जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और
समस्त लोकों का महान ईश्वर जानता है,
वह मनुष्यों में मोह से रहित होता है
और सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
🌍 English Translation
He who knows Me as unborn, without beginning,
and the Supreme Lord of all worlds,
that undeluded person among mortals
is freed from all sins.
📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या
भगवद गीता अध्याय 10 का यह तीसरा श्लोक आध्यात्मिक ज्ञान का शिखर है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर को सही रूप में जान लेना ही मोक्ष का मार्ग है।
भगवान स्वयं अपने स्वरूप की तीन विशेषताएँ बताते हैं:
1️⃣ अजम् (Ajam) – अजन्मा
भगवान का जन्म नहीं होता। वे किसी गर्भ से उत्पन्न नहीं हुए।
अवतार भले ही जन्म जैसा दिखाई दे, पर वह लीला है, बाध्यता नहीं।
2️⃣ अनादि (Anadi) – जिनका कोई प्रारंभ नहीं
भगवान समय से परे हैं।
समय उनके अधीन है, वे समय के अधीन नहीं।
3️⃣ लोकमहेश्वरम् (Loka-Maheshwaram) – समस्त लोकों के स्वामी
सिर्फ पृथ्वी नहीं, बल्कि सभी लोकों—स्वर्ग, पाताल, ब्रह्मलोक—के अधिपति।
जो मनुष्य भगवान को इस स्वरूप में पहचान लेता है, वह “असम्मूढः” कहलाता है—
अर्थात मोह, भ्रम और अज्ञान से मुक्त।
यहाँ भगवान स्पष्ट कहते हैं:
ऐसा व्यक्ति सर्वपापैः प्रमुच्यते —
यानी वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि उसने कोई पाप किया ही नहीं,
बल्कि यह कि ज्ञान की अग्नि में उसके पाप भस्म हो जाते हैं।
यह श्लोक यह भी सिखाता है कि:
👉 ईश्वर को आधा-अधूरा जानना पर्याप्त नहीं
👉 उन्हें परम सत्य के रूप में जानना ही मुक्ति देता है
📘 Detailed English Explanation
This verse reveals the transformative power of true divine knowledge.
Krishna declares that one who understands Him as:
Unborn (Ajam)
Beginningless (Anadi)
Supreme Lord of all worlds (Loka-Maheshwaram)
is no longer deluded by material illusion.
The term “undeluded” is key here. Delusion causes attachment, ego, fear, and sin. Knowledge of Krishna’s supreme nature destroys ignorance at its root.
Krishna does not say “those who worship Me blindly,” but rather:
“Those who truly know Me.”
Such knowledge leads to:
Detachment from ego
Freedom from karmic bondage
Liberation from sin
This verse beautifully unites Jnana (knowledge) and Bhakti (devotion).
🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)
🔸 हिंदी में
ईश्वर को जानना ही सबसे बड़ा पुण्य है
सच्चा ज्ञान मोह को नष्ट करता है
पाप कर्म से नहीं, अज्ञान से उत्पन्न होते हैं
भगवान को सर्वोच्च सत्य मानने से भय समाप्त होता है
ज्ञान और भक्ति साथ-साथ चलती हैं
🔸 In English
True knowledge of God leads to liberation
Ignorance is the root of all sin
Understanding God removes fear and ego
Knowledge and devotion are inseparable
Liberation begins with right understanding
🔔 निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 3 हमें यह अमूल्य सत्य सिखाता है कि
मोक्ष का मार्ग किसी बाहरी कर्म से नहीं, बल्कि सही ज्ञान से शुरू होता है।
जो व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण को अजन्मा, अनादि और समस्त लोकों का स्वामी मान लेता है,
वह जीवन के भ्रमों से ऊपर उठ जाता है।
ऐसा व्यक्ति न केवल आध्यात्मिक रूप से उन्नत होता है,
बल्कि कर्मों के बंधन और पापों से भी मुक्त हो जाता है।
यही विभूति योग का सार है।