📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥18॥
🔤 IAST Transliteration
vistareṇa ātmanaḥ yogaṁ vibhūtiṁ ca janārdana |
bhūyaḥ kathaya tṛptiḥ hi śṛṇvato nāsti me’mṛtam ||18||
🪔 हिंदी अनुवाद
अर्जुन ने कहा —
हे जनार्दन, अपने योग और विभूतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
मैंने सुनकर कभी तृप्ति नहीं पाई, यह मेरे लिए अमृत से भी अधिक है।
🌍 English Translation
Arjuna said:
O Janardana, please describe in detail Your yoga and divine manifestations.
I am never satisfied by hearing them; they are more delightful than nectar to me.
📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या
भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 18 में
अर्जुन की दिव्यता और श्रद्धा की चरम उत्कंठा प्रकट होती है।
अर्जुन अब तक भगवान श्रीकृष्ण की विभूतियों और योग के विभिन्न पहलुओं को सुन चुके हैं।
फिर भी, उनकी जिज्ञासा अनंत है और वे और अधिक विस्तार से जानना चाहते हैं।
अर्जुन बताते हैं कि यह सुनना उनके लिए अमरत्व के समान सुखद और आत्मसंतोषजनक है।
यह श्लोक सिखाता है कि सच्चा भक्त ज्ञान की अनंत लालसा रखता है और सतत आध्यात्मिक अनुभव चाहता है।
🔹 1. “विस्तरेण आत्मनो योगं” – अपने योग का विस्तार से वर्णन
अर्जुन का निवेदन है कि:
भगवान अपने योग (अद्वितीय दिव्यता, शक्ति, और नियंत्रण) का विस्तृत विवरण दें।
योग यहाँ केवल आसन या साधना नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि और ईश्वर के नियमों का दिव्य तंत्र है।
यह हमें याद दिलाता है कि ईश्वर का ज्ञान सतत और विस्तारपूर्ण होता है।
🔹 2. “विभूतिं च” – दिव्य विभूतियों का वर्णन
अर्जुन चाहते हैं कि श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों के बारे में विस्तार से बताएं:
प्रकृति में प्रकट दिव्यता
देवों और प्राणियों में व्याप्त शक्ति
सृष्टि के नियमों में ईश्वर का परिपूर्ण नियंत्रण
यह दर्शाता है कि सत्य और भक्ति का अनुभव निरंतर सीखने और जानने की प्रक्रिया है।
🔹 3. “भूयः कथय” – बार-बार सुनने की इच्छा
अर्जुन कहते हैं कि:
मुझे बार-बार सुनना चाहिए
हर बार सुनकर नई तृप्ति और आनंद प्राप्त होता है
यह भाव भक्त की अनंत श्रद्धा और जिज्ञासा को दर्शाता है
यह श्लोक हमें बताता है कि भक्ति में कभी संतोष नहीं, केवल सतत खोज और अनुभव की इच्छा होती है।
🔹 4. “तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मे अमृतम्” – सुनना अमृत के समान
अर्जुन कहते हैं कि श्रीकृष्ण की वाणी अमृत के समान मधुर और आनंददायक है।
सुनना कभी भी उबाऊ नहीं होता, बल्कि आध्यात्मिक तृप्ति प्रदान करता है।
यह दर्शाता है कि ईश्वर का ज्ञान और उपदेश हमेशा जीवित अनुभव है।
📘 Detailed English Explanation
In this verse, Arjuna expresses his intense desire for divine knowledge:
Expansion of Yoga: Understanding the supreme, all-encompassing divine yoga of Krishna.
Divine manifestations: Knowing how Krishna pervades the universe.
Repeated listening: Spiritual wisdom is never boring or complete; it always inspires more devotion.
Nectar-like satisfaction: Krishna’s teachings are sweeter than any worldly pleasure.
This emphasizes that true devotion is coupled with endless curiosity and reverence, where learning from the Lord is eternally fulfilling.
🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)
🔸 हिंदी में
सच्चा भक्त ज्ञान की अनंत लालसा रखता है
भगवान की दिव्यता और योग का अनुभव निरंतर सीखने योग्य है
पुनः-पुनः सुनना और समझना आध्यात्मिक विकास में सहायक है
भगवान का ज्ञान अमृत से भी अधिक आनंददायक है
आध्यात्मिक खोज में कभी तृप्ति नहीं, केवल अनुभव और भक्ति बढ़ती है
🔸 In English
A true devotee has an endless thirst for divine knowledge
Krishna’s yoga and manifestations are vast and continuous
Repeated listening deepens spiritual growth
Divine wisdom is more delightful than nectar
Spiritual quest leads to ever-increasing devotion and experience
🔔 निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 18
अर्जुन की अनंत भक्ति और आध्यात्मिक उत्कंठा का प्रतीक है।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि:
भगवान की दिव्यता और योग का अनुभव कभी पूर्ण नहीं होता
भक्त को हमेशा अधिक जानने और अनुभव करने की उत्कंठा रखनी चाहिए
यही विभूति योग का सार है – अंतहीन ज्ञान, भक्ति और तृप्ति का संगम