श्लोक 3
🕉️ संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥3॥
🔤 IAST Transliteration
tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nāti-mānitā |
bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata ||3||
🇮🇳 हिंदी अनुवाद
तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धता, किसी से द्वेष न करना और अभिमान का अभाव—हे भारत! ये दैवी संपदा में जन्मे मनुष्य के गुण होते हैं।
🇬🇧 English Translation
Vigor, forgiveness, fortitude, purity, freedom from hatred, and absence of excessive pride—these qualities belong to one born with divine nature, O Bharata.
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या
भगवद्गीता अध्याय 16 में श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि मनुष्य का आंतरिक स्वभाव ही उसके भाग्य का निर्माण करता है।
श्लोक 1 और 2 में दैवी गुणों की सूची दी गई, और श्लोक 3 उन गुणों को पूर्णता प्रदान करता है।
यह श्लोक यह स्पष्ट करता है कि दैवी जीवन का अर्थ दुर्बलता नहीं, बल्कि संतुलित शक्ति है।
1️⃣ तेजः (Tejas – आंतरिक तेज)
तेज का अर्थ बाहरी क्रोध या आक्रामकता नहीं, बल्कि—
👉 आत्मिक ऊर्जा, आत्मविश्वास और धर्म के लिए खड़े होने की शक्ति।
जिस व्यक्ति में तेज होता है:
वह अन्याय का विरोध करता है
सत्य के मार्ग पर अडिग रहता है
यह तेज अहंकार से नहीं, आत्मज्ञान से उत्पन्न होता है।
2️⃣ क्षमा (Kṣamā – क्षमा)
क्षमा कायरता नहीं, बल्कि महान आत्मिक बल है।
क्षमा करने वाला व्यक्ति—
अपने मन को हल्का रखता है
क्रोध और द्वेष से मुक्त रहता है
📌 क्षमा से शत्रु नहीं, बल्कि शांति की विजय होती है।
3️⃣ धृतिः (Dhṛti – धैर्य और दृढ़ता)
धृति का अर्थ है—
👉 कठिन परिस्थितियों में भी कर्तव्य से न डिगना।
सफल व्यक्ति वही है जो—
असफलता में टूटता नहीं
सुख-दुःख में संतुलित रहता है
4️⃣ शौचम् (Śaucam – शुद्धता)
शौच केवल शरीर की स्वच्छता नहीं है, बल्कि—
मन की पवित्रता
विचारों की निर्मलता
कर्मों की शुद्धता
आंतरिक शुद्धता के बिना कोई भी साधना सफल नहीं होती।
5️⃣ अद्रोहः (Adroha – द्वेष का अभाव)
द्वेष मनुष्य के हृदय में जहर की तरह काम करता है।
अद्रोह का अर्थ है—
👉 किसी के प्रति वैरभाव न रखना, भले ही उसने हमें कष्ट दिया हो।
यह गुण व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से ऊँचा उठाता है।
6️⃣ नातिमानिता (Nātimānitā – अहंकार का अभाव)
अति-मानिता अर्थात अत्यधिक अभिमान।
दैवी व्यक्ति—
अपनी उपलब्धियों पर घमंड नहीं करता
स्वयं को ईश्वर का साधन मानता है
📌 जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं भक्ति और ज्ञान का जन्म होता है।
🔑 श्लोक का समग्र अर्थ
श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि—
ये सभी गुण उसी व्यक्ति में पाए जाते हैं जो दैवी संपदा में जन्मा हो।
यह जन्म शारीरिक नहीं, बल्कि—
👉 संस्कारों, सत्संग और साधना से हुआ आध्यात्मिक जन्म है।
🌍 Detailed English Explanation
Verse 3 concludes the list of divine qualities by highlighting the balance between strength and humility.
Tejas represents spiritual vigor and moral courage.
Forgiveness reflects emotional maturity.
Fortitude allows perseverance through challenges.
Purity ensures clarity of thought and action.
Freedom from hatred dissolves inner conflicts.
Absence of pride keeps the ego in check.
Krishna emphasizes that these qualities collectively form the Divine Nature (Daivi Sampad), leading the soul toward liberation.
🌱 जीवन के लिए सीख (Life Lessons)
✅ हिंदी में
सच्चा तेज अहंकार नहीं, धर्म से आता है
क्षमा और धैर्य जीवन को सरल बनाते हैं
शुद्ध मन ही ईश्वर का निवास बन सकता है
अहंकार त्यागे बिना आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं
✅ In English
True strength lies in self-control and forgiveness
Patience builds lasting success
Inner purity is the foundation of spirituality
Humility opens the door to wisdom
🕯️ निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 3 यह सिखाता है कि दैवी गुणों का जीवन कोई कल्पना नहीं, बल्कि व्यावहारिक आदर्श है।
जब तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धता और विनम्रता हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं, तब मनुष्य ईश्वर के सबसे निकट पहुँच जाता है।
🌸 दैवी संपदा अपनाइए—जीवन स्वयं प्रकाशमान हो जाएगा।