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Friday, June 5, 2026

पुरुषोत्तम की भक्ति – भगवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 19 का दिव्य संदेश



📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥19॥


🔤 IAST Transliteration

yo mām evam asammūḍho jānāti puruṣottamam |
sa sarvavid bhajati mām sarvabhāvena bhārata || 15.19 ||


🇮🇳 हिंदी अनुवाद

जो व्यक्ति मुझ पुरुषोत्तम को इस प्रकार समझकर जानता है और भ्रम से मुक्त होता है, वह सर्वज्ञ है।
ऐसा व्यक्ति मुझे सर्वभाव से भक्ति और श्रद्धा के साथ पूजता है, हे भारत (अर्जुन)।


🇬🇧 English Translation

He who understands Me, the Supreme Person (Purushottama), without delusion, is truly wise.
Such a person, knowing all, worships Me with complete devotion, O Bharata (Arjuna).


🕉️ विस्तृत हिंदी व्याख्या (Detailed Hindi Explanation)

श्रीकृष्ण इस अंतिम श्लोक में पुरुषोत्तम की सच्ची भक्ति और ज्ञान का मार्ग स्पष्ट करते हैं। यह श्लोक अध्याय 15 का समापन है और सम्पूर्ण अध्याय का सार प्रस्तुत करता है।

🔹 समझ और मुक्ति

  • “अससम्मूढो जानाति” → वह व्यक्ति जो भ्रम और मोह से मुक्त है

  • भ्रम से मुक्ति का अर्थ है कि वह व्यक्ति संसार के क्षणिक और स्थायी तत्वों को सही रूप में पहचानता है

  • पुरुषोत्तम को समझने वाला ही सच्चा ज्ञानी और भक्त है

🔹 सर्वज्ञ और सर्वभाव भक्ति

  • “सर्वविद्भजति” → ज्ञानवान और सर्वज्ञ व्यक्ति

  • “मां सर्वभावेन” → हर भाव, हर कर्म और हर स्थिति में ईश्वर की भक्ति करता है

  • इसका अर्थ है कि भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू में ईश्वर की उपस्थिति को स्वीकार करना

🔹 अर्जुन के लिए संदेश

  • “भारत” → अर्जुन को संबोधित करते हुए

  • यह श्लोक बताता है कि सच्ची भक्ति और ज्ञान का मार्ग सरल है:

    • पुरुषोत्तम को जानो

    • भ्रम से मुक्त रहो

    • जीवन के हर कर्म में भक्ति करो

यह श्लोक ज्ञान, भक्ति और जीवन का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।


🌍 Detailed English Explanation

Krishna explains the path of true devotion to the Supreme Person:

1️⃣ Understanding without delusion

  • Recognizing Purushottama beyond perishable and imperishable

  • Realizing the eternal and supreme nature of God

2️⃣ All-knowing devotion

  • A person who knows God in all aspects is called Sarvavid (omniscient in devotion)

  • Such devotion is not limited to rituals, but permeates thoughts, actions, and emotions

3️⃣ Application in life

  • Every act becomes a form of worship when performed with awareness of Purushottama

  • The devotee experiences peace, wisdom, and liberation

Key Insight:

  • Knowledge (Jnana) and devotion (Bhakti) are inseparable in understanding and worshiping the Supreme

  • Liberation and true fulfillment come from this integrated practice


🧠 सच्ची भक्ति और ज्ञान का जीवन में महत्व

1️⃣ भ्रम और मोह से मुक्ति

  • व्यक्ति जब संसार की अस्थायी वस्तुओं से भ्रमित नहीं होता

  • तब वह पुरुषोत्तम का सच्चा अनुभव करता है

2️⃣ सर्वभाव भक्ति

  • भक्ति केवल मंदिर और पूजा तक सीमित नहीं है

  • जीवन के हर क्षेत्र, कार्य और भाव में ईश्वर की उपस्थिति को पहचानना ही सच्ची भक्ति है

3️⃣ ज्ञान और भक्ति का संगम

  • शास्त्र, साधना और अनुभव के माध्यम से व्यक्ति सर्वज्ञ और सच्चा भक्त बनता है

  • यही मार्ग मोक्ष और स्थायी शांति का है


🧘 आज के जीवन में श्लोक 15.19 का महत्व

आज के समय में लोग अक्सर केवल बाहरी भक्ति या केवल बौद्धिक ज्ञान पर निर्भर रहते हैं।

  • इस श्लोक के अनुसार सच्ची भक्ति और ज्ञान जीवन के हर क्षेत्र में ईश्वर की उपस्थिति को महसूस करने में है।

  • जीवन के हर अनुभव को ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से जीना ही असली पुरुषोत्तम भक्ति है।


🌱 Life Lessons / Moral Teachings

🕉️ हिंदी में जीवन शिक्षाएँ

  • पुरुषोत्तम को जानना और भ्रम से मुक्त रहना सच्चा ज्ञान है

  • सच्चा ज्ञानी और भक्त वही है जो सर्वभाव से ईश्वर की भक्ति करता है

  • भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के हर कर्म में हो

  • ज्ञान और भक्ति का संगम ही जीवन को पूर्ण और मोक्षकारी बनाता है

🌍 Life Lessons in English

  • Understanding Purushottama without delusion is true wisdom

  • The truly wise and devoted worship God in every action, emotion, and thought

  • Devotion is not limited to rituals but should permeate all aspects of life

  • The combination of knowledge and devotion leads to fulfillment and liberation


🔔 भक्ति और ज्ञान का संदेश

श्रीकृष्ण का यह श्लोक बताता है कि:

  • सच्चा साधक वह है जो पुरुषोत्तम को जानता है और भ्रम से मुक्त है

  • सच्ची भक्ति जीवन के हर पहलू में दिखाई देती है

  • इस भक्ति से साधक संसार के मोह और भय से मुक्त होता है और मोक्ष की प्राप्ति करता है


🧘‍♂️ निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद्गीता अध्याय 15 का श्लोक 19 हमें यह स्पष्ट करता है कि:

  • पुरुषोत्तम को समझना और भ्रम से मुक्त होना ज्ञान है

  • सच्चा भक्त वह है जो सभी भावों में ईश्वर की भक्ति करता है

  • यह श्लोक हमें जीवन, भक्ति और मोक्ष का अंतिम मार्ग दिखाता है

👉 यही श्लोक अध्याय 15 का सार और पुरुषोत्तम की भक्ति का परम संदेश है।

Thursday, June 4, 2026

पुरुषोत्तम का दिव्य स्वरूप – भगवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 18 का रहस्य

📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥18॥


🔤 IAST Transliteration

yasmāt kṣaram atīto’ham akṣarād api cottamaḥ |
ato’mi loke vede ca prathitaḥ puruṣottamaḥ || 15.18 ||


🇮🇳 हिंदी अनुवाद

मैं क्षर पुरुष से परे और अक्षर पुरुष से भी श्रेष्ठ हूँ।
इसी कारण मैं इस संसार में और वेदों में पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।


🇬🇧 English Translation

I am beyond the perishable (ksara) and superior to the imperishable (aksara).
Therefore, I am renowned in this world and in the Vedas as the Supreme Person (Purushottama).


🕉️ विस्तृत हिंदी व्याख्या (Detailed Hindi Explanation)

श्रीकृष्ण इस श्लोक में पुरुषोत्तम का सर्वोच्च दिव्य स्वरूप स्पष्ट करते हैं। यह श्लोक अध्याय 15 का अंतिम महत्वपूर्ण श्लोक है और संपूर्ण अध्याय का सार प्रस्तुत करता है।

🔹 क्षर और अक्षर से परे

  • “यस्मात् क्षरमतीतः” → मैं क्षर पुरुष से परे हूँ

    • क्षर = नश्वर, अस्थायी प्राणी और पदार्थ

    • इसका अर्थ है कि मैं जन्म-मरण और अस्थायी जीवन के चक्र से परे हूँ

  • “अक्षरादपि च उत्तमः” → मैं अक्षर पुरुष से भी श्रेष्ठ हूँ

    • अक्षर = शाश्वत आत्मा, स्थायी और अपरिवर्तनीय

    • मैं केवल स्थायी आत्मा नहीं, बल्कि उन सभी गुणों से भी परे और श्रेष्ठ हूँ

🔹 पुरुषोत्तम – परमात्मा का नाम

  • “पुरुषोत्तमः” → सर्वोच्च पुरुष

  • इस नाम से मुझे संसार और वेदों में प्रसिद्धि प्राप्त है

  • अर्थ: सभी जीवों और वेदों के लिए मैं सर्वोच्च, अनंत और अविनाशी शक्ति हूँ

🔹 आध्यात्मिक संदेश

  • साधक को यह समझना चाहिए कि ईश्वर न केवल नश्वर और स्थायी से परे है, बल्कि सर्वोच्च, अनंत और सर्वशक्तिमान है

  • पुरुषोत्तम की भक्ति ही सच्ची मोक्ष और शांति का मार्ग है


🌍 Detailed English Explanation

Krishna explains that He is the Supreme Person (Purushottama):

1️⃣ Beyond the perishable (ksara)

  • Not bound by the cycle of birth and death

2️⃣ Superior to the imperishable (aksara)

  • Beyond even the eternal soul or consciousness

3️⃣ Renowned in the world and the Vedas

  • All scriptures and beings recognize Him as Purushottama

Key Insight:

  • The Supreme Reality transcends both material and spiritual existence

  • True devotion to Purushottama leads to liberation and eternal peace


🧠 पुरुषोत्तम का जीवन में महत्व

1️⃣ सत्य और स्थायित्व का अनुभव

  • जीवन में क्षणिक सुख और दुख के पीछे न फंसना

  • पुरुषोत्तम में विश्वास रखने से मानसिक स्थिरता और शांति प्राप्त होती है

2️⃣ भक्ति और साधना का मार्ग

  • पुरुषोत्तम की भक्ति से साधक संसार के मोह और भय से मुक्त होता है

  • यह ज्ञान हमें बताता है कि ईश्वर सबसे उच्च, सबसे महान और सबसे सुरक्षित शक्ति है

3️⃣ ज्ञान और आत्मा की गहराई

  • क्षर और अक्षर दोनों से परे होने का अनुभव केवल साधना और भक्ति से संभव है

  • यही ज्ञान और पुरुषोत्तम का अनुभव हमें संपूर्ण जीवन में स्थायित्व और मोक्ष देता है


🧘 आज के जीवन में श्लोक 15.18 का महत्व

आज के समय में:

  • लोग केवल भौतिक और स्थायी चीज़ों में लगे रहते हैं

  • शास्त्र और ज्ञान का सही उपयोग नहीं कर पाते

  • पुरुषोत्तम की भक्ति और समझ हमें सत्य और शाश्वत जीवन के मार्ग की ओर ले जाती है

यह श्लोक हमें बताता है कि संपूर्ण सृष्टि और आत्मा का सर्वोच्च आधार पुरुषोत्तम है।


🌱 Life Lessons / Moral Teachings

🕉️ हिंदी में जीवन शिक्षाएँ

  • पुरुषोत्तम क्षर और अक्षर दोनों से परे हैं

  • जीवन में स्थायी शांति और मोक्ष के लिए उनकी भक्ति करें

  • भौतिक और आध्यात्मिक दोनों अनुभवों में ईश्वर की उपस्थिति को पहचानें

  • पुरुषोत्तम की भक्ति जीवन को पूर्ण और सच्चा बनाती है

🌍 Life Lessons in English

  • Purushottama transcends the perishable and imperishable

  • Devotion to the Supreme Person leads to eternal peace and liberation

  • Recognize God’s presence in both material and spiritual realms

  • Worshiping Purushottama makes life complete and meaningful


🔔 भक्ति और ज्ञान का संदेश

श्रीकृष्ण का यह श्लोक यह भी बताता है कि:

  • केवल ज्ञान या भक्ति अलग से पर्याप्त नहीं है

  • क्षर और अक्षर दोनों से परे सर्वोच्च पुरुषोत्तम का अनुभव ही सच्चा मार्ग है

  • यह अनुभव साधक को संसार के मोह और भय से मुक्त करता है


🧘‍♂️ निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद्गीता अध्याय 15 का श्लोक 18 हमें यह स्पष्ट करता है कि:

  • पुरुषोत्तम क्षर और अक्षर दोनों से परे हैं

  • वे संसार और वेदों में सर्वोच्च, अविनाशी और सर्वशक्तिमान हैं

  • सच्चा साधक वही है जो पुरुषोत्तम की भक्ति और ज्ञान में लीन रहता है

👉 यह श्लोक हमें सत्य, ज्ञान, और भक्ति का सर्वोच्च अनुभव प्रदान करता है।



Wednesday, March 4, 2026

🌟 “अर्जुन का प्रश्न – भगवान की उपस्थिति का ध्यान कैसे करें?” भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 17 – चिन्तन और भक्ति का रहस्य (विभूति योग)

📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥17॥


🔤 IAST Transliteration

kathaṁ vidyāmahaṁ yogin tvāṁ sadā paricintayan |
keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo’si bhagavan mayā ||17||


🪔 हिंदी अनुवाद

अर्जुन ने कहा —
हे भगवान, मैं आपको हमेशा ध्यान में रखते हुए कैसे समझ सकता हूँ?
आप किस प्रकार और किन-किन भावों में ध्यान करने योग्य हैं?


🌍 English Translation

Arjuna said:
O Lord, how can I constantly contemplate You?
In which forms or aspects should I meditate upon You?


📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या

भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 17 में
अर्जुन की जिज्ञासा और भक्ति की उत्कण्ठा स्पष्ट दिखाई देती है।

  • अर्जुन पहले श्लोकों में श्रीकृष्ण की दिव्यता और विभूतियों को जान चुके हैं।

  • अब वे पूछते हैं कि कौन सा मार्ग, कौन सा भाव या ध्यान उनसे जुड़ने में सबसे उपयुक्त है।

यह श्लोक बताता है कि भक्ति केवल विश्वास या शब्दों तक सीमित नहीं होती, बल्कि चिन्तन, स्मृति और अनुभव के माध्यम से भगवान से संपर्क स्थापित करना आवश्यक है।


🔹 1. “कथं विद्यामहं योगिन” – भगवान का चिन्तन कैसे करूँ

अर्जुन पूछते हैं:

  • भगवान को निरंतर स्मरण करने और ध्यान करने का सही तरीका क्या है?

  • इसे केवल मानसिक याद या भौतिक पूजा से कैसे नहीं सीमित किया जा सकता।

यह हमें सिखाता है कि योग और भक्ति का मार्ग सक्रिय और जागरूक होना चाहिए।


🔹 2. “सदा परिचिन्तयन्” – हमेशा ध्यान रखना

  • सतत चिन्तन = नियमित, निरंतर, और समर्पित भाव

  • केवल समय-समय पर स्मरण नहीं, बल्कि जीवन के हर कर्म में ईश्वर की उपस्थिति को ध्यान में रखना

यह चिन्तन भक्त के जीवन में स्थिरता, शांति और आत्मज्ञान लाता है।


🔹 3. “केषु केषु च भावेषु” – किन-किन भावों में

अर्जुन पूछते हैं:

  • भगवान किस रूप में, किन भावों में स्मरणीय हैं?

  • यह दर्शाता है कि ईश्वर की उपस्थिति अनेक रूपों में अनुभव की जा सकती है:

    • प्रकृति में

    • प्राणियों में

    • स्वयं के हृदय में

    • आध्यात्मिक अभ्यास और कर्म में

भगवान सभी रूपों में व्याप्त हैं, और भक्त को मार्गदर्शन उनके हर रूप में मिलता है।


🔹 4. “चिन्त्योऽसि भगवन्मया” – आप मेरी भक्ति और चिन्तन के योग्य हैं

अर्जुन का यह श्लोक दर्शाता है कि सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है।

  • केवल श्रद्धा पर्याप्त नहीं

  • सही ज्ञान और समझ आवश्यक हैं कि कहाँ और कैसे भगवान का ध्यान किया जाए

श्रीकृष्ण ने इसके उत्तर में अगले श्लोकों में भक्ति योग और चिन्तन के मार्ग स्पष्ट किए हैं।


📘 Detailed English Explanation

In this verse, Arjuna expresses a key question of devotion:

  • Constant contemplation: How can one maintain awareness of God in daily life?

  • In which aspects or forms: Should one meditate on God’s cosmic form, personal form, or inner essence?

  • This verse emphasizes that true devotion involves mindful attention, not just ritual.

  • Krishna’s guidance will show that God is present in all aspects of creation and consciousness, and meditation can be adapted accordingly.


🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)

🔸 हिंदी में

  1. भक्ति केवल शब्दों या पूजा तक सीमित नहीं होती

  2. भगवान का चिन्तन सतत और जागरूक होना चाहिए

  3. सभी जीवों, प्रकृति और कर्म में ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करें

  4. मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए सच्ची जिज्ञासा आवश्यक है

  5. चिन्तन से भक्त का हृदय स्थिर और चेतन बनता है

🔸 In English

  1. Devotion is more than rituals or words

  2. Contemplation of God should be continuous and mindful

  3. Recognize God in beings, nature, and actions

  4. True curiosity and inquiry guide spiritual practice

  5. Meditation stabilizes and elevates the devotee’s heart


🔔 निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 17
अर्जुन की सच्ची भक्ति और चिन्तन की जिज्ञासा को दर्शाता है।

यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि:

  • भगवान का ध्यान केवल नाम या रूप में नहीं,

  • बल्कि मन, हृदय और भावों में हमेशा सतत स्मरण से किया जा सकता है।

  • यही विभूति योग का अभ्यास है –
    सच्ची भक्ति, चिन्तन और ज्ञान का संगम।


Tuesday, March 3, 2026

🌟 “अर्जुन की आत्मज्ञानपूर्ण उद्घोषणा – पुरुषोत्तम की पहचान” भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 15 – पुरुषोत्तम का दिव्य स्वरूप (विभूति योग)

📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥15॥


🔤 IAST Transliteration

svayamevātmān-ātmānaṁ vettha tvaṁ puruṣottama |
bhūta-bhāvana bhūteśa devadeva jagat-pate ||15||


🪔 हिंदी अनुवाद

अर्जुन ने कहा —
आप स्वयं अपने आप को जानते हैं, पुरुषोत्तम।
आप ही सब प्राणियों के सृजनकर्ता, सभी जीवों के अधिपति, देवों के देव और जगत के पालक हैं।


🌍 English Translation

Arjuna said:
You alone know Yourself, O Supreme Person (Purushottama).
You are the creator of all beings, Lord of all creatures, God of gods, and the protector of the universe.


📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या

भगवद गीता अध्याय 10 का यह श्लोक
अर्जुन की परम श्रद्धा और दिव्यता की आत्म-स्वीकृति को दर्शाता है।

यह श्लोक पिछले श्लोकों (10.12–10.14) का सार प्रस्तुत करता है और
भगवान श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम के रूप में पहचानने का चरम बिंदु है।


🔹 1. “स्वयमेव आत्मनात्मानं वेत्थ” – स्वयं को जानने वाले

अर्जुन कहते हैं कि:

  • पुरुषोत्तम स्वयं अपने स्वरूप और महिमा को जानता है।

  • वह केवल देखे नहीं जाते; वह स्वयं-प्रकाशित और स्वयं-ज्ञानवान हैं।

यह दर्शाता है कि ईश्वर:

  • अपने अस्तित्व का स्रोत स्वयं है

  • सीमित या परोक्ष नहीं है


🔹 2. “पुरुषोत्तम” – सर्वोच्च पुरुष

  • पुरुषोत्तम = सभी पुरुषों का, सभी प्राणियों का सर्वोच्च पुरुष

  • केवल मानव रूप या भौतिक शक्ति का नहीं, बल्कि
    सर्वव्यापक, अजर-अमर, और अनंत शक्ति का प्रतिनिधित्व

अर्जुन इसे उच्चतम भक्ति और ज्ञान का प्रमाण मानते हैं।


🔹 3. “भूतभावन भूतेश” – सभी जीवों के सृजनकर्ता और अधिपति

भगवान सभी जीवों के भाव और प्रकृति के स्रोत हैं।

  • भूतभावन = सभी प्राणियों का सृजनकर्ता

  • भूतेश = सभी जीवों का अधिपति

अर्थात:

सभी जीव उनकी इच्छा और शक्ति से जीवित हैं।

यह श्लोक ईश्वर-केन्द्रित सृष्टि दर्शन को स्पष्ट करता है।


🔹 4. “देवदेव जगत्पते” – देवों के देव और जगत के पालक

यह अंतिम पद:

  • देवों के देव = सभी देवताओं का सर्वोच्च

  • जगत्पते = सम्पूर्ण ब्रह्मांड का पालन करने वाले

इससे अर्जुन यह स्वीकार करते हैं कि
श्रीकृष्ण का स्वरूप समस्त ब्रह्मांडीय सत्ता का स्रोत है।


📘 Detailed English Explanation

In this verse, Arjuna fully recognizes Krishna as Purushottama – the Supreme Being.

Key insights:

  • Self-aware divinity: Krishna knows His own nature.

  • Creator of all beings: Every life is sustained by His will.

  • Supreme Lord of all gods: Beyond human or divine comprehension.

  • Protector of the universe: Maintains cosmic order.

This verse consolidates the previous acknowledgments (10.10–10.14) into complete surrender and understanding.

It emphasizes that true devotion involves recognizing God as the Supreme Lord, the ultimate source of all existence.


🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)

🔸 हिंदी में

  1. पुरुषोत्तम केवल देवताओं का नहीं, सम्पूर्ण ब्रह्मांड का अधिकारी हैं

  2. आत्मज्ञान से ही परम सत्ता को समझा जा सकता है

  3. सृष्टि और जीवों का आधार भगवान हैं

  4. भक्ति और ज्ञान से मन में स्थिरता और शांति आती है

  5. ईश्वर के सर्वोच्च रूप को स्वीकारना सबसे बड़ी श्रद्धा है

🔸 In English

  1. Purushottama is supreme over all beings and the universe

  2. Self-realization leads to understanding the Supreme

  3. God is the foundation of all creation

  4. Knowledge and devotion bring inner peace

  5. Accepting the supreme form of God is the highest act of faith


🔔 निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 15
अर्जुन की पूर्ण श्रद्धा और दिव्यता की अंतिम स्वीकृति का प्रतीक है।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि:

  • परम पुरुषोत्तम की पहचान केवल बुद्धि और अनुभव से होती है

  • श्रद्धा और भक्ति के माध्यम से मन परम सत्य को स्वीकार करता है

  • सभी जीव, देव और ब्रह्मांड उसी पुरुषोत्तम के अधीन हैं

यही विभूति योग का सार और ज्ञान-भक्ति संगम है।


🔱 ज्ञान, भक्ति और धर्म का अंतिम संदेश | भगवद गीता अध्याय 18 श्लोक 78 का अर्थ

📜 संस्कृत श्लोक (Devanagari) यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥78॥ 🔤 IAST Translit...