📜 संस्कृत श्लोक (Devanagari)
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥47॥
🔤 IAST Transliteration
śreyān sva-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣṭhitāt |
svabhāva-niyataṃ karma kurvann āpnoti kilbiṣam || 18.47 ||
🪔 हिंदी अनुवाद
अपना स्वधर्म (अपने स्वभाव और कर्तव्य) निभाना किसी और के धर्म को निभाने से बेहतर है।
जो व्यक्ति अपने स्वभाव अनुसार कर्म करता है, वह पाप या दोष से मुक्त रहता है।
🌍 English Translation
One’s own duty, even if imperfectly performed, is better than performing another’s duty perfectly.
By performing actions according to one’s nature, a person avoids sin and attains righteousness.
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या (Detailed Hindi Explanation)
यह श्लोक गीता का एक बहुत महत्वपूर्ण संदेश है: स्वधर्म का पालन सर्वोत्तम है।
🔸 “श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः”
स्वधर्म: व्यक्ति के गुण, स्वभाव और योग्यता के अनुसार कर्तव्य
विगुणः: भले ही वह कर्म पूर्ण या उत्कृष्ट न हो
इसका अर्थ: अपने कर्तव्य का पालन करना हमेशा दूसरों के धर्म से श्रेष्ठ है, चाहे वह अन्य धर्म अधिक कठिन या उत्कृष्ट क्यों न लगे
🔸 “परधर्मात्स्वनुष्ठितात्”
परधर्म: किसी और का धर्म या कर्तव्य
इसे निभाने में व्यक्ति असफल हो सकता है क्योंकि यह उसके स्वभाव और गुणों के अनुकूल नहीं है
ऐसे कार्य करने में मानसिक तनाव और दोष लग सकते हैं
🔸 “स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्”
स्वभावनियत कर्म: अपने गुण और स्वभाव के अनुसार किया गया कर्म
इससे व्यक्ति किल्बिष (पाप, दोष) से मुक्त रहता है
यह कर्मयोग और आत्मिक प्रगति का मार्ग है
🔸 आधुनिक जीवन में संदेश
आज:
लोग दूसरों की तुलना में अपने जीवन को आकार देने की कोशिश करते हैं
यह श्लोक हमें सिखाता है कि अपना मार्ग और कर्तव्य अपनाएँ, दूसरों की नकल या उनके कर्म की तुलना में
इससे जीवन में संतोष, सफलता और नैतिक स्थिरता मिलती है
🌱 Detailed English Explanation
This verse emphasizes the supremacy of performing one’s own duties (Swadharma).
🔹 Key Points
Swadharma (one’s own duty): Duties aligned with personal qualities, nature, and abilities
Even if imperfect: Imperfectly performed self-duty is better than perfectly performing another’s duty
Avoiding sin: Acting according to one’s nature prevents errors, guilt, or ethical misalignment
🔹 Modern Relevance
Many people attempt roles or responsibilities not aligned with their strengths
Gita teaches: focus on your own responsibilities and strengths
This leads to:
Satisfaction
Ethical conduct
Personal and professional success
🌼 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)
🪔 हिंदी जीवन-पाठ
अपना स्वधर्म निभाएँ
अपने गुण और योग्यता के अनुसार कर्म करना सर्वोत्तम है।दूसरों के धर्म की नकल न करें
दूसरों के कार्यों की तुलना करने से मानसिक असंतोष और गलत निर्णय हो सकते हैं।संतोष और नैतिकता
स्वधर्म का पालन करने से व्यक्ति मानसिक और नैतिक रूप से स्थिर रहता है।सफलता का मार्ग
सफलता उन्हीं को मिलती है जो अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करते हैं।कर्मयोग और आत्मिक प्रगति
अपने कर्म को अपने स्वभाव के अनुसार करना आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।
🌿 English Life Lessons
Follow your own duty
Acting according to your nature and abilities is always superior.Avoid imitating others
Comparing or copying others can cause dissatisfaction and mistakes.Inner satisfaction and morality
Swadharma ensures ethical and mental stability.Path to success
True success comes to those who perform duties aligned with their nature.Karma Yoga and spiritual progress
Performing duties according to one’s nature fosters spiritual growth.
🔔 आधुनिक जीवन में श्लोक 18.47 की प्रासंगिकता
आज के समय में:
करियर, पेशा और व्यक्तिगत जीवन में लोग अक्सर दूसरों के रास्ते अपनाने की कोशिश करते हैं
गीता का यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि अपना मार्ग चुनें और उसमें निष्ठा रखें
यह दृष्टिकोण जीवन में संतुलन, स्थिरता और सफलता लाता है
गीता सिखाती है कि:
अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करना, किसी अन्य के मार्ग से बेहतर है।
🧘♂️ निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद गीता का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि:
स्वधर्म का पालन सर्वोत्तम है, चाहे वह कर्म पूर्ण न भी हो
दूसरों के धर्म का अनुकरण करने से पाप और असफलता का खतरा रहता है
अपने स्वभाव और गुणों के अनुसार कर्म करना सिद्धि, संतोष और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है
जो व्यक्ति अपने स्वधर्म में संलग्न रहता है, वही जीवन में स्थिरता, सफलता और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करता है।