📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
अर्जुन उवाच ।
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥12॥
🔤 IAST Transliteration
arjuna uvāca |
paraṁ brahma paraṁ dhāma pavitraṁ paramaṁ bhavān |
puruṣaṁ śāśvataṁ divyam ādi-devam ajaṁ vibhum ||12||
🪔 हिंदी अनुवाद
अर्जुन ने कहा —
आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं,
आप परम पवित्र हैं।
आप शाश्वत, दिव्य पुरुष हैं,
आदि देव हैं, अजन्मा और सर्वव्यापक हैं।
🌍 English Translation
Arjuna said:
You are the Supreme Brahman,
the supreme abode and the supreme purifier.
You are the eternal divine Person,
the primal God, unborn and all-pervading.
📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या
भगवद गीता अध्याय 10 का यह बारहवाँ श्लोक भक्ति और ज्ञान के अद्भुत संगम को दर्शाता है।
अब तक भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप, विभूतियों और करुणा का वर्णन कर चुके हैं।
इन वचनों को सुनकर अर्जुन का हृदय पूर्ण रूप से जागृत हो जाता है।
यह श्लोक केवल स्तुति नहीं है—
👉 यह आत्मज्ञान से उत्पन्न स्वीकारोक्ति है।
🔹 1. “परं ब्रह्म” – आप परम सत्य हैं
अर्जुन कहते हैं कि श्रीकृष्ण:
केवल देवता नहीं
केवल अवतार नहीं
बल्कि परम ब्रह्म, अर्थात अंतिम सत्य हैं
वेदांत के अनुसार:
ब्रह्म = जो स्वयं प्रकाशमान है और सबका आधार है
अर्जुन यहाँ श्रीकृष्ण को उसी निराकार-साकार परम सत्य के रूप में पहचानते हैं।
🔹 2. “परं धाम” – आप अंतिम आश्रय हैं
“धाम” का अर्थ केवल स्थान नहीं है।
यह है:
शांति का केंद्र
मोक्ष का आधार
जहाँ पहुँचकर आत्मा को कोई भय नहीं रहता
अर्जुन स्वीकार करते हैं कि:
सभी प्राणियों का अंतिम गंतव्य श्रीकृष्ण ही हैं।
🔹 3. “पवित्रं परमं” – आप स्वयं पवित्रता हैं
यहाँ अर्जुन कहते हैं:
भगवान पवित्र करने वाले नहीं
बल्कि स्वयं पवित्रता का स्रोत हैं
उनकी स्मृति मात्र से:
मन शुद्ध होता है
बुद्धि स्थिर होती है
और आत्मा ऊँची उठती है
🔹 4. “पुरुषं शाश्वतं दिव्यम्” – शाश्वत दिव्य पुरुष
यह “पुरुष” शब्द अत्यंत गूढ़ है।
यह संकेत करता है:
चेतना
आत्मतत्त्व
और सृष्टि के पीछे की दिव्य शक्ति
श्रीकृष्ण:
समय से परे हैं
जन्म-मृत्यु से परे हैं
और सदा एकरस हैं
🔹 5. “आदिदेवम् अजं विभुम्” – आदि देव, अजन्मा, सर्वव्यापक
अर्जुन यहाँ तीन महान सत्य बताते हैं:
आदिदेवम् – सभी देवताओं के भी देव
अजम् – जिनका कभी जन्म नहीं हुआ
विभुम् – जो सर्वत्र व्याप्त हैं
यह स्पष्ट करता है कि:
श्रीकृष्ण सीमित व्यक्तित्व नहीं,
बल्कि समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त परम सत्ता हैं।
📘 Detailed English Explanation
In this verse, Arjuna openly declares Krishna’s supreme divinity.
This is not blind belief.
It is realization born from:
Divine teachings
Inner clarity
Removal of ignorance
By calling Krishna:
Supreme Brahman
Eternal Divine Person
Unborn and All-pervading
Arjuna aligns Krishna with the ultimate reality described in the Upanishads.
This verse marks a turning point where devotion becomes absolute surrender.
🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)
🔸 हिंदी में
सच्चा ज्ञान विनम्र स्वीकार से आता है
ईश्वर को पहचानना ही जीवन का लक्ष्य है
भक्ति ज्ञान से और ज्ञान भक्ति से पूर्ण होता है
परम सत्य का बोध जीवन को दिशा देता है
जब भ्रम मिटता है, सत्य स्वतः प्रकट होता है
🔸 In English
True realization leads to surrender
God is the ultimate refuge
Knowledge and devotion complete each other
Recognition of truth transforms life
Enlightenment begins with acceptance
🔔 निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 12 वह क्षण है
जब अर्जुन संदेह से श्रद्धा की अवस्था में पहुँचते हैं।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि:
जब हृदय शुद्ध होता है
जब बुद्धि प्रकाशित होती है
तब आत्मा स्वयं परम सत्य को पहचान लेती है
अर्जुन की यह वाणी
हर साधक के लिए आत्मिक जागरण का मार्गदर्शन है।
यही विभूति योग का ज्ञान-भक्ति संगम है।