श्लोक 7
🕉️ संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥7॥
🔤 IAST Transliteration
pravṛttiṁ ca nivṛttiṁ ca janā na vidur āsurāḥ |
na śaucaṁ nāpi cācāro na satyaṁ teṣu vidyate ||7||
🇮🇳 हिंदी अनुवाद
हे पार्थ! आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग न तो धर्म की ओर प्रवृत्त होते हैं और न ही निष्क्रिय रहते हैं।
उनमें न शुद्धता, न अच्छे आचार और न सत्य का कोई स्थान है।
🇬🇧 English Translation
Those born with demoniac nature neither know right action nor abstention.
In them there is no cleanliness, no proper conduct, and no truth.
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या
भगवद्गीता अध्याय 16 अब पूरी तरह आसुरी गुणों पर प्रकाश डालने लगी है।
श्लोक 7 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आसुरी व्यक्ति के स्वभाव की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं।
यह श्लोक हमें चेतावनी देता है कि नैतिक पतन केवल बाहरी कारणों से नहीं होता, बल्कि स्वभाव और संस्कारों से जन्म लेता है।
1️⃣ प्रवृत्ति और निवृत्ति का अभाव
श्लोक में कहा गया है—
“प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः”
प्रवृत्ति: कर्म करने की दिशा और जिम्मेदारी
निवृत्ति: कर्म से संयम और विराम
आसुरी व्यक्ति में न तो वे सही कर्म करने का ज्ञान रखते हैं, न ही संयम का।
यह संतुलनहीनता उन्हें हमेशा विनाश की ओर ले जाती है।
2️⃣ शौच का अभाव
शौच केवल बाहरी सफाई नहीं, बल्कि मन, विचार और आचरण की पवित्रता भी है।
आसुरी व्यक्ति में यह शुद्धता नहीं होती।
परिणामस्वरूप उनका मन और समाज दूषित होता है।
3️⃣ आचार का अभाव
आचार का अर्थ है सत्य और धर्म के अनुसार व्यवहार।
आसुरी लोग नियम और मर्यादा को तोड़ते हैं।
उनके कर्म केवल स्वार्थ और लालच के चलते होते हैं।
4️⃣ सत्य का अभाव
सत्य केवल बोलने में नहीं, बल्कि आचरण में ईमानदारी है।
आसुरी स्वभाव में झूठ और छल सर्वोपरि होते हैं।
यह गुण उन्हें सत्य और न्याय से दूर ले जाता है।
🔑 श्लोक का संदेश
श्रीकृष्ण बताते हैं कि आसुरी गुणों का जीवन केवल बंधन और संकट का कारण बनता है।
इन गुणों से—
व्यक्ति नैतिक पतन की ओर बढ़ता है
आत्मिक विकास रुक जाता है
समाज और संबंध भी प्रभावित होते हैं
गीता हमें यह चेतावनी देती है कि सतत आत्मनिरीक्षण और धर्म का पालन अनिवार्य है।
🌍 Detailed English Explanation
Verse 7 emphasizes the practical implications of demonic traits:
Lack of discernment: They cannot distinguish between right and wrong
Impurity: Their mind and actions are defiled
Absence of discipline: They follow selfish desires
Falsehood: They ignore truth, even in thought or speech
Krishna warns that those with Asuri nature live in chaos and bondage, trapped by their own impulses.
🌱 जीवन के लिए सीख (Life Lessons)
✅ हिंदी में
संतुलनहीनता और अज्ञान जीवन को असफल बनाते हैं
शुद्धता, आचार और सत्य का पालन अनिवार्य है
आत्मनिरीक्षण से ही आसुरी प्रवृत्तियों से बचा जा सकता है
सही मार्ग पर चलने से मोक्ष का मार्ग खुलता है
✅ In English
Lack of self-control and knowledge leads to failure
Purity, discipline, and truth are essential
Self-reflection helps overcome demonic tendencies
Following the right path leads to liberation
🕯️ निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 7 यह स्पष्ट करता है कि
👉 आसुरी स्वभाव का जीवन बंधन और दुःख की ओर ले जाता है।
श्रीकृष्ण हमें यह संदेश देते हैं कि
केवल ज्ञान ही नहीं,
बल्कि आचार और स्वभाव का शुद्धिकरण भी मोक्ष की कुंजी है।
🌸 अपने भीतर के आसुरी गुणों को पहचानें और उन्हें त्यागें—सफल जीवन और मोक्ष आपके कदम चूमेंगे।
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