श्लोक 8
🕉️ संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥8॥
🔤 IAST Transliteration
asatyam apratiṣṭhaṁ te jagad āhur anīśvaram |
aparaspara-sambhūtaṁ kim anyat kāma-haitukam ||8||
🇮🇳 हिंदी अनुवाद
हे पार्थ! असत्य और अनिश्चितता पर आधारित संसार को ही लोग ईश्वर मानते हैं।
संसार आपस में उत्पन्न हुआ है; इसमें केवल काम और इच्छा ही कारण माने जाते हैं।
🇬🇧 English Translation
O Partha! The world, founded on untruth and instability, is what people consider as God.
It arises mutually and is governed by desire alone.
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या
श्लोक 8 में श्रीकृष्ण ने आसुरी स्वभाव और भ्रामक जीवन दृष्टि की गहन व्याख्या की है।
यह श्लोक बताता है कि आसुरी प्रवृत्तियों वाले लोग संसार को कैसे गलत दृष्टि से देखते हैं।
1️⃣ असत्यमप्रतिष्ठं — असत्य और अस्थिरता
“असत्यमप्रतिष्ठं” का अर्थ है कि संसार असत्य और अस्थिरता पर आधारित है।
असुरी व्यक्ति केवल बाहरी भौतिक सुख, शक्ति और लालच में विश्वास करता है।
वे सच्चाई और धर्म से दूर रहते हैं।
📌 असत्य पर आधारित जीवन कभी स्थायी सुख नहीं दे सकता; यह सदा असंतोष और दुःख देता है।
2️⃣ जगदाहुरनीश्वरम् — भ्रमित दृष्टि
ऐसे लोग संसार को ही ईश्वर मान लेते हैं।
वे भूल जाते हैं कि संसार केवल कर्म और प्रकृति का मैदान है, ईश्वर उससे अलग है।
यही दृष्टिकोण उन्हें मोह और बंधन में डालता है।
3️⃣ अपरसपरसम्भूतं — आपसी उत्पत्ति
संसार आपस में उत्पन्न हुआ है।
सब कुछ केवल कारण और परिणाम का खेल है, केवल काम (इच्छा) ही प्रेरक शक्ति है।
आसुरी व्यक्ति केवल तात्कालिक सुख और स्वार्थ के पीछे भागते हैं।
4️⃣ कामहैतुकम् — इच्छा पर आधारित
केवल इच्छा और लालसा संसार की गति निर्धारित करती है।
आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग इसे सर्वोच्च मानते हैं।
वे भौतिक सुख, लोभ और वासनाओं के पीछे पड़ते हैं, परिणामस्वरूप बंधन और दुख बढ़ता है।
🔑 श्लोक का संदेश
श्रीकृष्ण हमें यह चेतावनी देते हैं कि आसुरी दृष्टि का जीवन—
भ्रमित और असत्य पर आधारित
स्थिरता और सच्चाई से दूर
केवल काम और लालसा द्वारा प्रेरित
ऐसे जीवन में सत्य और मोक्ष का मार्ग नहीं है।
🌍 Detailed English Explanation
Verse 8 exposes the illusory worldview of demonic nature:
They mistake the transient world as God.
They are attached to mutual causation and desire as the only motive.
This leads to confusion, bondage, and suffering.
Krishna explains that understanding the divine versus demonic perspective is critical to achieving liberation.
🌱 जीवन के लिए सीख (Life Lessons)
✅ हिंदी में
संसार केवल काम और वासनाओं का खेल नहीं है
असत्य पर आधारित जीवन स्थायी सुख नहीं देता
सही दृष्टि अपनाना—दैवी गुणों की ओर बढ़ना—आवश्यक है
मोक्ष केवल भ्रम और इच्छा पर आधारित दृष्टि से दूर जाकर मिलता है
✅ In English
Life is not just a pursuit of desire
False and unstable foundations never bring lasting happiness
Adopting divine vision is essential
Liberation comes from transcending illusion and desire
🕯️ निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 8 यह सिखाता है कि आसुरी दृष्टि के कारण मनुष्य अपने बंधन में फँस जाता है।
श्रीकृष्ण हमें चेतावनी देते हैं कि केवल सत्य और स्थिरता पर आधारित जीवन और दैवी गुण ही हमें मुक्त कर सकते हैं।
🌸 अपने विचारों और दृष्टि को शुद्ध करें—सत्य और मोक्ष का मार्ग खुल जाएगा।
No comments:
Post a Comment