🕉️ संस्कृत श्लोक (Devanagari)
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥4॥
🔤 IAST Transliteration
sarva-yoniṣu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ |
tāsāṁ brahma mahad yonir ahaṁ bīja-pradaḥ pitā ||4||
📜 हिंदी अनुवाद
हे कौन्तेय (अर्जुन)!
समस्त योनियों में जितनी भी देहधारी प्रजातियाँ उत्पन्न होती हैं,
उन सबकी महान प्रकृति (महद् ब्रह्म) योनि है
और मैं उनका बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ।
📘 English Translation
O son of Kunti (Arjuna),
all forms of life that arise in every species—
the great material nature is their womb,
and I am the seed-giving Father.
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या
भगवद्गीता अध्याय 14 के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण संपूर्ण सृष्टि की आध्यात्मिक एकता को अत्यंत स्पष्ट शब्दों में प्रकट करते हैं। यह श्लोक केवल दर्शन नहीं, बल्कि मानव समाज के लिए एक क्रांतिकारी संदेश है।
“सर्वयोनिषु कौन्तेय” — श्रीकृष्ण कहते हैं कि चाहे कोई भी योनि हो—मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, जलचर या वनस्पति—सभी जीव एक ही ब्रह्मांडीय व्यवस्था से उत्पन्न होते हैं।
“मूर्तयः सम्भवन्ति याः” — जितनी भी देहधारी आकृतियाँ दिखाई देती हैं, वे सभी केवल बाहरी रूप में भिन्न हैं। भीतर से सबमें वही एक आत्मा विद्यमान है।
“तासां ब्रह्म महद्योनिः” — यहाँ महद् ब्रह्म का अर्थ है प्रकृति, जो सभी जीवों की माता के समान है। यह प्रकृति भगवान के नियंत्रण में कार्य करती है।
“अहं बीजप्रदः पिता” — यह वाक्य गीता के सबसे शक्तिशाली कथनों में से एक है। श्रीकृष्ण स्वयं को सभी जीवों का पिता घोषित करते हैं। अर्थात न केवल मनुष्य, बल्कि हर प्राणी ईश्वर की संतान है।
यह श्लोक जाति, धर्म, रंग, प्रजाति और ऊँच-नीच के सभी भेदों को आध्यात्मिक स्तर पर पूर्णतः नकार देता है। यदि ईश्वर सभी का पिता है, तो कोई भी जीव तुच्छ नहीं है।
🌍 Detailed English Explanation
In this verse, Lord Krishna delivers one of the most unifying spiritual truths of the Bhagavad Gita. He declares that all life forms—across every species—share a common origin.
Material nature acts as the womb, while Krishna Himself is the seed-giving Father. This establishes both divine unity and divine responsibility toward all beings.
The differences we observe—human, animal, plant—are external and temporary. Spiritually, all beings are equal because all originate from the same divine source.
This verse forms the foundation of compassion, non-violence, and universal brotherhood. When one understands this truth, hatred, superiority, and discrimination lose their meaning.
🌱 जीवन के लिए सीख / Life Lessons
📌 हिंदी में
सभी प्राणी ईश्वर की संतान हैं
जाति, धर्म और प्रजाति का भेद आध्यात्मिक सत्य नहीं है
हर जीव सम्मान और करुणा के योग्य है
अहंकार अज्ञान से उत्पन्न होता है
📌 In English
All living beings share the same divine Father
External differences do not define spiritual worth
Compassion arises from true knowledge
Humility is born from understanding our origin
🔔 निष्कर्ष / Conclusion
गीता अध्याय 14 का यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि संपूर्ण सृष्टि एक ही परिवार है। जब हम यह समझ लेते हैं कि हर जीव ईश्वर की ही संतान है, तब शोषण, घृणा और भेदभाव का कोई स्थान नहीं रह जाता।
आज के संघर्षपूर्ण और विभाजित संसार में यह श्लोक हमें एकता, करुणा और सार्वभौमिक भाईचारे का मार्ग दिखाता है।