📜 संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥5॥
🔤 IAST Transliteration
ahiṁsā samatā tuṣṭis tapo dānaṁ yaśo’ yaśaḥ |
bhavanti bhāvā bhūtānāṁ matta eva pṛthag-vidhāḥ ||5||
🪔 हिंदी अनुवाद
अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान,
यश और अपयश —
प्राणियों के ये विविध भाव
मुझसे ही भिन्न-भिन्न रूपों में उत्पन्न होते हैं।
🌍 English Translation
Non-violence, equanimity, contentment, austerity, charity,
fame and infamy —
the diverse states of beings
arise from Me alone in their various forms.
📖 विस्तृत हिंदी व्याख्या
भगवद गीता अध्याय 10 का यह पाँचवाँ श्लोक मानव जीवन के नैतिक, मानसिक और सामाजिक गुणों का स्रोत स्पष्ट करता है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अहिंसा जैसे उच्च गुण और यश–अपयश जैसे सामाजिक अनुभव — दोनों ही ईश्वर से उत्पन्न होते हैं।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि कोई भी गुण केवल हमारी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। जब मनुष्य अपने गुणों का श्रेय स्वयं को देता है, तब अहंकार जन्म लेता है; और जब वह उन्हें ईश्वर की देन मानता है, तब विनम्रता।
🔹 अहिंसा (Ahimsa)
केवल शारीरिक हिंसा से बचना ही नहीं,
बल्कि विचार, वाणी और भावना में भी किसी को आहत न करना।
भगवान बताते हैं कि अहिंसा स्वाभाविक रूप से उन्हीं की कृपा से आती है।
🔹 समता (Samatā)
सफलता–असफलता, सुख–दुःख में समान भाव।
यह गीता का केंद्रीय संदेश है।
🔹 तुष्टि (Contentment)
आज के उपभोगवादी युग में दुर्लभ गुण।
संतोष ही वास्तविक धन है।
🔹 तप (Tapas)
आत्म-संयम और अनुशासन।
तप शरीर को नहीं, अहंकार को जलाता है।
🔹 दान (Dāna)
केवल धन नहीं,
समय, ज्ञान और करुणा का दान भी ईश्वर की प्रेरणा से होता है।
🔹 यश और अयश
मनुष्य अक्सर यश को चाहता है और अपयश से डरता है।
पर भगवान स्पष्ट कहते हैं — दोनों ही क्षणिक हैं
और दोनों का उद्देश्य आत्म-विकास है।
इस श्लोक में “पृथग्विधाः” शब्द बहुत महत्वपूर्ण है —
अर्थात ईश्वर एक ही है, पर उसके भाव जीवों में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होते हैं।
📘 Detailed English Explanation
In this verse, Krishna reveals that moral virtues and social outcomes are also manifestations of the Divine.
Qualities like non-violence, contentment, and charity are not random traits; they arise through divine influence shaped by individual nature.
Similarly, fame and infamy are not absolute measures of worth. They are temporary conditions meant to teach detachment.
This verse teaches seekers to:
Avoid pride in virtue
Avoid despair in disgrace
See divine order in all experiences
Everything operates under Krishna’s will, though expressed diversely.
🌱 जीवन के लिए शिक्षाएँ (Life Lessons)
🔸 हिंदी में
गुणों का श्रेय स्वयं को नहीं, ईश्वर को देना चाहिए
यश और अपयश दोनों अस्थायी हैं
संतोष ही सच्चा सुख है
अहिंसा विचार से शुरू होती है
जीवन की विविधता में भी ईश्वर की एकता है
🔸 In English
Virtues are gifts, not achievements
Fame and infamy are temporary
Contentment leads to peace
Non-violence begins in the mind
Diversity exists within divine unity
🔔 निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद गीता अध्याय 10 श्लोक 5 हमें यह गहरा सत्य सिखाता है कि
मानव जीवन के सभी गुण, अवस्थाएँ और अनुभव ईश्वर से ही उत्पन्न होते हैं।
जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं, तब न अहंकार रहता है, न ही हीनभाव।
जीवन सहज, सरल और संतुलित बन जाता है।
यही विभूति योग की आत्मा है —
हर गुण और हर अनुभव में ईश्वर को देखना।