Wednesday, May 28, 2025

भगवद् गीता श्लोक 2.14 – सुख-दुःख को समान भाव से सहना सीखो | Gita Chapter 2 Verse 14 Meaning & Life Lessons मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

भगवद् गीता श्लोक 2.14 – सुख-दुःख को समान भाव से सहना सीखो | Gita Chapter 2 Verse 14 Meaning & Life Lessons


📜 संस्कृत श्लोक

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥


🪷 Sanskrit Transliteration

Mātrā-sparśās tu kaunteya śītoṣṇa-sukha-duḥkha-dāḥ,
Āgamāpāyino'nityās tāṁs titikṣasva bhārata.


🧠 हिन्दी में विस्तृत व्याख्या (Hindi Explanation)

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं:

"हे कौन्तेय! इन्द्रिय और उनके विषयों का जो संपर्क होता है, वही सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख का कारण बनता है। ये सब क्षणिक और परिवर्तनशील हैं, अतः हे भारत! इन्हें सहन करना सीखो।"

यह श्लोक हमें बताता है कि इन्द्रियों के विषयों (touch, taste, sound, smell, sight) से ही सुख-दुःख का अनुभव होता है। जैसे ठंड या गर्मी, पीड़ा या आनंद — यह सब बाहर की परिस्थितियों पर आधारित होते हैं और अस्थायी होते हैं।

“तात्पर्य यह है कि जीवन में आने वाला सुख या दुःख स्थायी नहीं है, इसलिए इनके प्रभाव में आकर विचलित नहीं होना चाहिए।”


🌍 English Explanation in Depth

Lord Krishna says to Arjuna:

“O son of Kunti, the contact between the senses and their objects gives rise to feelings of cold, heat, pleasure, and pain. These are temporary and constantly changing. Therefore, O Bharata, learn to tolerate them.”

This verse is a beautiful piece of stoic wisdom that teaches us emotional balance and mental fortitude. Pain and pleasure, heat and cold — these are sensory experiences that come and go. We must rise above them with titiksha — the power of endurance.


🧘‍♀️ Philosophical Significance

  • इन्द्रिय-संयोग से उत्पन्न अनुभव: हमारे सुख-दुख बाहरी परिस्थितियों पर आधारित होते हैं, वे आत्मा से संबंधित नहीं।

  • अनित्य प्रकृति: ये अनुभव स्थायी नहीं, वे आते हैं और चले जाते हैं।

  • सहनशीलता (Titiksha): आध्यात्मिक उन्नति के लिए हमें सहिष्णुता और मानसिक संतुलन की आवश्यकता है।


🌱 Life Lessons & Practical Applications

  1. Don’t Overreact to Emotions: दुःख आने पर टूट जाना और सुख में फूले नहीं समाना — यह असंतुलन है।

  2. Endure with Strength: शीत-ग्रीष्म, सफलता-विफलता, प्रशंसा-आलोचना — इन सब को धैर्यपूर्वक सहें।

  3. Temporary Nature of Pain: कोई भी कठिनाई हमेशा नहीं रहती, समय के साथ बीत जाती है।

  4. Train the Mind: मानसिक शक्ति बढ़ाना जरूरी है ताकि हम जीवन की हर परिस्थिति का सामना कर सकें।

  5. Spiritual Detachment: जब हम बाहरी अनुभवों को आत्मा से अलग समझते हैं, तो हम मुक्त होने लगते हैं।


🔄 Modern-Day Relevance

आज की दुनिया में, जहाँ लोग छोटी-छोटी बातों पर तनाव, अवसाद या गुस्से में आ जाते हैं, यह श्लोक मानसिक दृढ़ता और सहिष्णुता की गहरी सीख देता है। चाहे वह किसी का अपमान हो या असफलता — यह सब अस्थायी हैं। हमें अपने मन को इतना मजबूत बनाना चाहिए कि वह इन अनुभवों को झेल सके बिना संतुलन खोए।


🕉️ Spiritual Perspective

योग और अध्यात्म की दृष्टि से यह श्लोक "तितिक्षा" की महत्ता को दर्शाता है। यह वो शक्ति है जो साधक को ध्यान, सेवा और तप में अडिग बनाए रखती है, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो। बिना तितिक्षा के आत्मज्ञान संभव नहीं।


🧘‍♂️ Quotes Inspired by This Verse

“Pain is temporary, but the soul is eternal — endure, and transcend.”
– Inspired by Bhagavad Gita 2.14

“The wise see beyond duality. Be like the sky — unshaken by storms.”
– Gita Mindset


📝 निष्कर्ष (Conclusion in Hindi)

इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन के सुख-दुख, सर्दी-गर्मी जैसे अनुभव केवल इन्द्रियजन्य हैं — वे आत्मा की सच्चाई नहीं हैं। वे क्षणिक हैं और बदलते रहते हैं। हमें इनको सहन करने का अभ्यास करना चाहिए ताकि हम जीवन में स्थिरता और शांति प्राप्त कर सकें। सहनशीलता से ही हम आत्मा की वास्तविक स्थिति तक पहुँच सकते हैं। यही अध्यात्म की दिशा है — स्थायी शांति और आत्मसाक्षात्कार की ओर।


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