श्लोक 2
🕉️ संस्कृत श्लोक (देवनागरी)
यस्तु विश्वासमपरं श्रद्धां निरधिष्ठाय च ।
कुरुते ज्ञानकर्मेण स निर्गुणोऽभिजानतः ॥2॥
🔤 IAST Transliteration
yastu viśvāsaṁ aparaṁ śraddhāṁ niradhiṣṭhāya ca |
kurute jñāna-karmeṇa sa nirguṇo'bhijānataḥ ||2||
🇮🇳 हिंदी अनुवाद
जो व्यक्ति सामान्य (निष्क्रिय या कम योग्य) श्रद्धा को छोड़कर
स्थिर और दृढ़ श्रद्धा के साथ ज्ञानपूर्वक कर्म करता है,
वह निर्गुण (गुणों से परे) माना जाता है।
🇬🇧 English Translation
One who abandons inferior faith and, firmly established in steady faith,
performs actions with knowledge is considered transcendental (beyond the modes of material nature).
🧠 विस्तृत हिंदी व्याख्या
श्लोक 2 में श्रीकृष्ण ने श्रद्धा और ज्ञानकर्म का महत्व स्पष्ट किया है।
यह श्लोक बताता है कि सच्ची श्रद्धा और ज्ञानयुक्त कर्म व्यक्ति को निर्गुण (गुणों से परे) बनाते हैं, अर्थात् व्यक्ति दैवी गुणों की ओर अग्रसर होता है और आसुरी प्रवृत्तियों से मुक्त होता है।
1️⃣ विश्वासमपरं — inferior faith
यहाँ “विश्वासमपरं” का अर्थ है कमज़ोर, अस्थिर या अनुचित श्रद्धा, जो केवल बाहरी कर्मों या अंधविश्वास में रहती है।
ऐसी श्रद्धा आध्यात्मिक प्रगति नहीं कराती।
2️⃣ निरधिष्ठाय च — दृढ़ और स्थिर श्रद्धा
सच्ची श्रद्धा स्थिर और आत्मिक ज्ञान पर आधारित होती है।
व्यक्ति जब कर्म करता है, तो वह धर्म, विवेक और आध्यात्मिक दृष्टि से प्रेरित होता है।
3️⃣ ज्ञानकर्मेण — ज्ञानयुक्त कर्म
केवल कर्म करना ही पर्याप्त नहीं है; कर्म ज्ञान और विवेक के साथ होना चाहिए।
यह कर्म गुणों के बंधन से परे निर्गुण स्थिति की ओर ले जाता है।
🔑 श्लोक का संदेश
श्रीकृष्ण इस श्लोक में स्पष्ट करते हैं कि:
अस्थिर श्रद्धा छोड़ें और ज्ञान के साथ कर्म करें
ऐसा कर्म व्यक्ति को दैवी गुणों और मोक्ष की ओर ले जाता है
केवल बाहरी कर्म या अंध श्रद्धा से आत्मिक उन्नति संभव नहीं है
🌍 Detailed English Explanation
Verse 2 highlights faith and knowledge in action:
Krishna emphasizes abandoning inferior or superficial faith and acting with steadfast, true faith.
Actions performed with knowledge and awareness elevate the soul beyond the modes of material nature (transcendental or nirguna).
This teaches that faith alone is not enough; it must be combined with understanding and conscious action.
🌱 जीवन के लिए सीख (Life Lessons)
✅ हिंदी में
कमजोर या अस्थिर श्रद्धा से आत्मिक उन्नति संभव नहीं है
कर्म को ज्ञान और स्थिर श्रद्धा के साथ करना आवश्यक है
ज्ञानयुक्त कर्म व्यक्ति को निर्गुण स्थिति और मोक्ष की ओर ले जाता है
केवल बाहरी पूजा या कर्म से सच्चा आध्यात्मिक विकास नहीं होता
✅ In English
Weak or superficial faith does not lead to spiritual progress
Actions should be performed with knowledge and firm faith
Knowledge-based actions elevate one to transcendental state and liberation
Mere external rituals or actions cannot ensure true spiritual growth
🕯️ निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 2 यह स्पष्ट करता है कि स्थिर और ज्ञानयुक्त श्रद्धा के साथ कर्म करना ही व्यक्ति को निर्गुण और मोक्ष की ओर ले जाता है।
श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि असत्य और कमजोर श्रद्धा को त्यागकर, विवेक और ज्ञान के साथ कर्म करना ही जीवन में सच्ची उन्नति है।
🌸 सच्ची श्रद्धा और ज्ञानयुक्त कर्म अपनाएँ—सच्चे जीवन और मोक्ष की ओर बढ़ें।